शिमला और हिमाचल के विभिन्न शहरों में फुटपाथों पर अवैध कब्जों और रेहड़ी-फड़ी के कारण पैदल यात्रियों को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

​सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब दस्तक का बड़ा रियलिटी चेक: हिमाचल के सभी जिलों में फुटपाथों पर माफिया का कब्जा, वोटों की राजनीति के चक्कर में जनता की जान जोखिम में

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विशेष महा-रिपोर्ट: पंजाब दस्तक
​ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा
पंजाब दस्तक: भेषज (धर्मशाला), उमांशी राणा (हमीरपुर), काजल (ऊना/बिलासपुर)


​शिमला/धर्मशाला/मंडी/हमीरपुर।
फुटपाथ पर सुरक्षित चलना कोई खैरात नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक का संवैधानिक और मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है—सर्वोच्च अदालत के इस ऐतिहासिक और बेहद तल्ख फैसले के बाद ‘पंजाब दस्तक’ की टीम ने पूरे हिमाचल प्रदेश में एक व्यापक ग्राउंड रियलिटी चेक किया है। हमारे वरिष्ठ पत्रकारों की इस संयुक्त जमीनी रिपोर्ट में जो हकीकत सामने आई है, वह सरकारी दावों की पोल खोलने वाली है। करोड़ों-लाखों रुपए खर्च करके जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई पगडंडियां और फुटपाथ आज पूरी तरह से अवैध कब्जों, रेहड़ी-फड़ी और रसूखदार बाजार माफिया की गिरफ्त में घुट रहे हैं।


​पूरे प्रदेश में यह सारा खेल केवल और केवल वोटों की राजनीति के चक्कर में हो रहा है। अक्सर “गरीब हैं, पेट पाल रहे हैं” का इमोशनल कार्ड खेलकर और राजनीतिक नफे-नुकसान को देखकर इन अवैध कब्जों को सीधा संरक्षण दिया जाता है। लेकिन पंजाब दस्तक सीधा सवाल करता है कि क्या वोटों की इस राजनीति और ‘पेट पालने’ की आड़ में मासूम स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और आम राहगीरों को मौत के मुंह में धकेला जा सकता है? सड़कों पर दौड़ती तेज रफ्तार बसों और हैवी ट्रैफिक के बीच, जब पैदल चलने वाले इन अवैध कब्जों के कारण मुख्य सड़क पर उतरने को मजबूर होते हैं, तो पलक झपकते ही जिंदगी खत्म हो जाती है।


​सुप्रीम कोर्ट का वो तगड़ा चाबुक, जिसने कानून की सुस्ती को बेनकाब किया
​जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने सड़क हादसे में एक 5 साल के मासूम बच्चे की दर्दनाक मौत से जुड़े मामले पर जो फैसला दिया है, वह पूरे सिस्टम के गाल पर तमाचा है।
​संविधान का हवाला: सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि फुटपाथ पर सुरक्षित और सुलभ तरीके से चलना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत नागरिकों का मूल अधिकार है।
​वाहनों से ज्यादा पैदल चलने वालों का हक: कोर्ट ने साफ कहा कि सड़क पर वाहनों से चलने वालों की तुलना में पैदल चलने वालों के अधिकारों को प्राथमिकता और सर्वोच्च स्थान (Top Priority) दिया जाना चाहिए।
​अधिकारों की सीमा: फैसले में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस मौलिक अधिकार में सुरक्षित, सुलभ और उचित रूप से फुटपाथों तक पहुंच शामिल है।


​मोटर वाहन अधिनियम पर तीखा प्रहार: पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि मोटर वाहन अधिनियम (1988) ने असल में पैदल चलने वालों के बेहद कीमती और बुनियादी अधिकारों को मजबूत करने के बजाय कमजोर किया है और यह कानून एक रुकावट साबित हुआ है। अदालत ने साफ किया कि यह उपाय मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत मिलने वाले उपायों से बिल्कुल अलग है।
​सुरक्षित माहौल की वकालत: सर्वोच्च अदालत ने देश भर में चलने के लिए सुरक्षित और आरामदायक फुटपाथों की भारी कमी का विशेष जिक्र किया है। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि पैदल चलने के मौलिक अधिकार के लिए बस एक आसान और बेफिक्र चलने के लिए आरामदायक जगह चाहिए, राहगीरों के मन में किसी भी वाहन या हादसे का डर नहीं होना चाहिए। अदालत ने अब इसके लिए एक सख्त कानूनी ढांचा और नियामक इकाई बनाने की वकालत की है।


​राजधानी शिमला का Ground Zero: वीआईपी इलाकों से लेकर उपनगरों तक वीभत्स हालात
​जब प्रदेश की राजधानी और मुख्य प्रशासनिक केंद्र का यह हाल है, तो बाकी जिलों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। शिमला के चप्पे-चप्पे पर फुटपाथों को सरेआम निगल लिया गया है:
​लोकल बस स्टैंड के पास बने ओवरब्रिज (पुल) और सीढ़ियों का बुरा हाल: शिमला के लोकल बस स्टैंड के पास जो ओवरब्रिज (पुल) और ऊपर की तरफ जाने वाली सीढ़ियां राहगीरों के पैदल चलने के लिए बनाई गई हैं, उन पर बाजार माफिया का कब्जा है। वहां सीढ़ियों और पुल पर लोग सरेआम बैठकर चूड़ियां (बैंगल्स) और दूसरा तमाम सामान बेच रहे हैं। लोकल बस स्टैंड के इस पूरे रास्ते पर ऊपर तक इस कदर अतिक्रमण है कि आम जनता को वहां से गुजरने के लिए जगह तक नहीं मिलती और लोग यह जानने को मजबूर हैं कि आखिर प्रशासन इस बदहाली को कब दूर करेगा।


​घोड़ा चौकी पर दोहरा नुकसान (भयानक ट्रैफिक जाम का मुख्य कारण): घोड़ा चौकी और इसके आसपास तो अतिक्रमण के कारण इतना बुरा हाल हो चुका है कि यहां आधा-आधा घंटा तक लंबा ट्रैफिक जाम लगा रहता है। पगडंडियों और सड़कों के दोनों किनारों पर बैठे रेहड़ी-फड़ी वालों की वजह से लोग मुख्य सड़क पर चलने को मजबूर होते हैं, जिससे शिमला में ट्रैफिक रेंगने लगता है। यह जनता के लिए दोहरा नुकसान है—एक तरफ जान का खतरा और दूसरी तरफ कीमती समय की बर्बादी। पूरे प्रदेश और राजधानी के ट्रैफिक जाम का एक सबसे बड़ा कारण यही अवैध कब्जे हैं।


​कमिश्नर, डीसी और एसपी महोदय को FIELD पर उतरकर देखना होगा सच: शिमला नगर निगम के म्युनिसिपल कमिश्नर, जिलाधीश (डीसी) महोदय और पुलिस अधीक्षक (एसपी) महोदय जो अपनी बेहतरीन कार्यप्रणाली के लिए जाने जाते हैं, उन्हें अब दफ्तरों से बाहर निकलकर खुद फील्ड पर आकर इस भयावह जमीनी हकीकत को देखना होगा। जनता और ट्रैफिक की इस बदहाली को दूर करने के लिए प्रशासन को पूरी खुली छूट मिलनी चाहिए और इन अवैध पटरियों व कब्जों पर सख्ती से बुलडोजर चलना चाहिए।


​कांग्रेस भवन के साथ, लिफ्ट और टैक्सी स्टैंड: शिमला के सबसे व्यस्त ‘लिफ्ट’ के पास, कांग्रेस भवन के बिल्कुल साथ लगते इलाके और टैक्सी स्टैंड के साथ बनी पगडंडियों पर फल विक्रेताओं (फ्रूट्स बेचने वालों) का परमानेंट कब्जा हो चुका है।
​संजौली बाजार, ढली और परी महल: संजौली के मुख्य बाजार में तो परे तक इतना बुरा हाल है कि सड़कों और फुटपाथों पर लोग सरेआम दुकानें सजाकर बैठे हैं। यही स्थिति ढली, परी महल और न्यू शिमला की पगडंडियों की है, जिन्हें बाजार माफिया ने घेर रखा है।
​विधानसभा के नीचे और 103 सुरंग: लोकतंत्र के मंदिर ‘विधानसभा’ के ठीक नीचे और रेलवे लाइन से ऊपर 103 सुरंग के पास पगडंडियों पर सब्जी वाले पैर पसारे बैठे हैं।


​बालूगंज और डिस्पेंसरी मार्ग: बालूगंज बाजार में डिस्पेंसरी के आगे तक लोगों ने दुकानों का सामान और रेहड़ियां फुटपाथों पर लगा रखी हैं, जिससे यहां हर समय हादसे का अंदेसा बना रहता है।
​समर हिल और लक्कड़ बाजार: वीआईपी और शैक्षणिक हब माने जाने वाले समर हिल और लक्कड़ बाजार के पास सरकार द्वारा बनाई गई पगडंडियों पर सरेआम कोई चाय बना रहा है, कोई उबले अंडे और ब्रेड बेच रहा है, तो कोई केले और सब्जियां सजाकर बैठा है।
​एमएलए क्वार्टर, मुख्य बस स्टैंड और पंचायत भवन: एमएलए क्वार्टर के पास, 103 और मुख्य बस स्टैंड के पास (जहां से समर हिल और अन्य रूटों के लिए बसें जाती हैं) से लेकर पंचायत भवन तक अनगिनत सब्जी वाले फुटपाथ घेरे खड़े हैं, जिससे पैदल निकलना पूरी तरह दूभर हो गया है।


​पंजाब दस्तक टीम की कंबाइंड रिपोर्ट: अन्य जिलों से Ground Zero रिपोर्ट
​पंजाब दस्तक की टीम ने जब प्रदेश के अन्य प्रमुख जिलों और पर्यटन स्थलों का रुख किया, तो वहां भी स्थिति बेहद गंभीर पाई गई:
​1. धर्मशाला और मैक्लोडगंज (ब्यूरो रिपोर्ट: भेषज)
​अंतरराष्ट्रीय पर्यटन नगरी धर्मशाला और विशेषकर मैक्लोडगंज में जहां देश-विदेश से हजारों टूरिस्ट आते हैं, वहां पैदल चलने के रास्तों (फुटपाथों) को पूरी तरह से घेर लिया गया है। सैलानी पगडंडियों की बजाय जान जोखिम में डालकर मुख्य सड़कों पर चलने को मजबूर हैं, जिससे आए दिन पर्यटकों और स्थानीय लोगों के बीच झगड़े और एक्सीडेंट हो रहे हैं।


​2. हमीरपुर, ऊना और बिलासपुर (ब्यूरो रिपोर्ट: उमांशी राणा/काजल)
​हमीरपुर के मुख्य बाजारों, चौक-चौराहों और पगडंडियों का भी移 यही हाल है, वहां भी फुटपाथों पर लोग अवैध रूप से पैर पसारे हैं। ऊना और बिलासपुर जिलों में भी सड़कों के किनारे बने फुटपाथों पर अवैध रूप से खोखे और रेहड़ियां सजा दी गई हैं, जिससे पैदल चलने वालों का हक सरेआम हक हड़पा जा रहा है।


​3. मंडी और कुल्लू-मनाली
​मंडी शहर के व्यस्ततम चौकों से लेकर विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी कुल्लू-मनाली तक, जहां भी फुटपाथ बने हैं, वहां हल्का बिजनेस करने वालों ने कब्जे जमा रखे हैं। मनाली आने वाले देश-विदेश के टूरिस्ट भी इस भारी अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही को देखकर हैरान हैं।
​पंजाब दस्तक के जरिए पूछती है हिमाचल की जनता: क्या अब खाली हो पाएंगे फुटपाथ?
​हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार कड़े और ऐतिहासिक फैसले लेने के लिए जानी जाती है। सर्वोच्च अदालत के इस बेहद स्पष्ट और कड़े रुख के बाद अब पंजाब दस्तक के जरिए हिमाचल की जनता प्रशासन और सरकार से सीधे सवाल पूछ रही है:
​पूछती है हिमाचल की जनता: क्या सुप्रीम कोर्ट के इन सख्त आदेशों के बाद अब हिमाचल के शहरों और बाजारों के फुटपाथ सच में खाली हो पाएंगे?
​पूछती है हिमाचल की जनता: क्या वोटों की राजनीति के इस घटिया चक्कर और ‘गरीबी का बहाना’ छोड़कर प्रशासन इन अवैध कब्जों और बेखौफ माफिया पर कड़ा हंटर चलाएगा?


​पूछती है हिमाचल की जनता: बच्चों, बुजुर्गों की जान सुरक्षित करने और दमघोंटू ट्रैफिक जाम से मुक्ति दिलाने के लिए क्या शिमला के लोकल बस स्टैंड के ओवरब्रिज व सीढ़ियों, घोड़ा चौकी, कार्ट रोड, लिफ्ट, संजौली सहित प्रदेश की सभी पगडंडियों को कब्जामुक्त कराया जाएगा?
​सड़कें और फुटपाथ आम जनता की आवाजाही के लिए हैं। रोजगार देने के अन्य विकल्प तलाशे जा सकते हैं, उन्हें बूथ बनाकर दिए जा सकते हैं, लेकिन यह सब नागरिकों के मौलिक अधिकार, उनके कीमती समय और उनकी जिंदगी की कीमत पर नहीं होना चाहिए। अब देखना यह है कि डिसीजन मेकिंग में माहिर सुक्खू सरकार वोटों की राजनीति से ऊपर उठकर, जिला अधिकारियों को खुली छूट देकर इस गंभीर समस्या पर क्या और कितनी जल्दी एक्शन लेती है।


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