कुल्लू BDC चुनाव: बहुमत के बावजूद भाजपा हारी उपाध्यक्ष सीट

​बहुमत का सूपड़ा साफ: कुल्लू बीडीसी चुनाव में भाजपा की बड़ी फजीहत, ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ में गंवाई उपाध्यक्ष की सीट!​बड़ा सवाल: चुनाव से पहले 15 दिन बंद कमरों में सोए रहे दिग्गज, अब हार के बाद ‘मंथन’ का ढोंग क्यों?

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पंजाब दस्तक
​वरिष्ठ पत्रकार भेषज, पंजाब दस्तक
​कुल्लू:
​कहते हैं कि राजनीति में अति-आत्मविश्वास (ओवरकॉन्फिडेंस) बड़े-से-बड़े सूरमाओं की लुटिया डुबो देता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है कुल्लू जिला भाजपा के बड़े क्षत्रपों ने। कुल्लू जिला मुख्यालय ढालपुर के ब्लॉक समिति कार्यालय में जो हुआ, उसने भाजपा संगठन की रणनीतिक कंगाली और आपसी गुटबाजी को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। 18 सदस्यों वाली इस समिति में स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद भाजपा उपाध्यक्ष का पद कांग्रेस की झोली में डाल बैठी। अब हार का मुंह देखने के बाद पूर्व मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह ठाकुर हार के कारणों की ‘समीक्षा’ और ‘मंथन’ की बात कर रहे हैं। इस पर आम जनता और राजनीतिक गलियारे ठहाके लगा रहे हैं कि—”जब चिड़िया चुग गई खेत, तो फिर मंथन का क्या हेत? यह अक्ल अगर चुनाव से 15 दिन पहले आ जाती, तो आज यह फजीहत न करवानी पड़ती।”


​बंद कमरों की ‘सुस्ती’ पड़ी भारी: 15 दिन क्या कर रहे थे नेता?
​भाजपा के पास चुनाव की तैयारी के लिए पर्याप्त समय था। 10 से 15 दिन का लंबा वक्त था, जब नाराज चल रहे पार्षदों और बीडीसी सदस्यों को बंद कमरों में बिठाकर समझाया जा सकता था, उनकी नाराजगी दूर की जा सकती थी और उन्हें एकजुट कर यह अहसास कराया जा सकता था कि “सीट हर हाल में हमारी ही रहनी चाहिए।” लेकिन, पूर्व मंत्री और स्थानीय नेताओं को लगा कि बहुमत तो अपनी जेब में है, जाएगा कहाँ! इसी ढिलाई और लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि अंदर ही अंदर सुलग रही गुटबाजी ने ऐन मौके पर भाजपा का खेल बिगाड़ दिया।
​आंकड़ों ने खोली पोल: अध्यक्ष पद पर 10, तो उपाध्यक्ष पर 9 कैसे रह गए?


​चुनावी प्रक्रिया में भाजपा की अंतर्कलह साफ उजागर हो गई:
​अध्यक्ष पद: भाजपा समर्थित यमुना ठाकुर को 10 वोट मिले और वे अध्यक्ष चुन ली गईं। यहाँ बहुमत दिखा।
​उपाध्यक्ष पद: लेकिन जैसे ही उपाध्यक्ष पद की बारी आई, भाजपा का एक वोट खिसक गया। भाजपा समर्थित नूप राम को केवल 9 वोट मिले, जबकि कांग्रेस समर्थित सुंदर ठाकुर (सुंदर सिंह) को भी 9 वोट मिल गए।


​पर्ची खुली तो किस्मत ने भी दिया झटका:
मुकाबला 9-9 वोटों से टाई होने के बाद पर्ची (लॉटरी) सिस्टम का सहारा लेना पड़ा। जब नीयत साफ न हो, तो किस्मत भी साथ छोड़ देती है। पर्ची कांग्रेस के सुंदर ठाकुर के नाम की निकली और स्पष्ट बहुमत वाली भाजपा के हाथ से सीट फिसलकर कांग्रेस के पाले में चली गई।


​कानूनी पेंच: अब पूरे 2 साल के लिए गई सीट, पछतावे से क्या होगा?
​इस करारी शिकस्त के बाद पूर्व मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर भले ही अब गहरी सोच में डूबे हैं, लेकिन पंचायती राज नियमों के मुताबिक अब बहुत देर हो चुकी है। नियमानुसार, नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष के खिलाफ अगले 2 साल तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। यानी भाजपा नेताओं की एक लापरवाही की वजह से यह अहम सीट अब पूरे दो साल के लिए कांग्रेस के पास चली गई है।


​हारने के बाद मंथन करना सिर्फ अपनी नाकामी पर परदा डालने की कोशिश है। अगर यही माथापच्ची पहले की होती, तो भाजपा को यूँ सरेआम शर्मिंदा न होना पड़ता। कुल्लू भाजपा के नेताओं का यह ढीलापन पार्टी कार्यकर्ताओं को लंबे समय तक चुभेगी।


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