हिमाचल की 43 दवाएं फेल, 264 सैंपल घटिया; जिम्मेदार कौन?

​व्यवस्था परिवर्तन या सेहत से खिलवाड़? देश भर में 157 दवाओं के सैंपल फेल, हिमाचल की 43 दवाएं ‘जहर’ साबित!​बड़ा सवाल: जो मरीज दवाएं खा चुके, उनकी जान का जिम्मेदार कौन? ड्रग विभाग की ‘मिलीभगत’ और नोटिस के खेल पर उठे गंभीर सवाल!

Spread the love

पंजाब दस्तक
​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक
​सोलन:

​हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार के ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के दावों के बीच प्रदेश के सबसे बड़े उद्योग हब से एक ऐसी डरावनी तस्वीर सामने आई है, जिसने जनता की सांसें अटका दी हैं। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की ओर से जारी मई माह के ड्रग अलर्ट ने पूरे देश समेत हिमाचल के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा दिया है। देश भर में कुल 157 दवाओं के सैंपल फेल हुए हैं, जिनमें से अकेले हिमाचल प्रदेश की 43 दवाओं के सैंपल गुणवत्ता जांच में घटिया पाए गए हैं।


​यह कोई मामूली दवाएं नहीं हैं, बल्कि बीपी, शुगर, कोमा, कैंसर, दिल की बीमारी और बच्चों की खांसी जैसी जान बचाने वाली दवाएं हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब सिस्टम सोया हुआ था और दवाएं बाजार में धड़ल्ले से बिक रही थीं, तब जिन मरीजों ने इन ‘नकली’ और घटिया दवाओं को खा लिया, उनके जीवन के साथ हुए इस खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन है?


​जनवरी से मई तक 264 सैंपल फेल: कहाँ हैं ड्रग इंस्पेक्टर?
​आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि हिमाचल में दवाओं की गुणवत्ता भगवान भरोसे है। इस साल जनवरी से लेकर मई तक कुल 264 दवाओं के सैंपल फेल हो चुके हैं।
​बड़ा सवाल: दवा कंपनियों की चेकिंग के लिए तैनात ड्रग कंट्रोलर, डिप्टी ड्रग कंट्रोलर और फील्ड के ड्रग इंस्पेक्टर आखिर दफ्तरों में बैठकर क्या कर रहे हैं?
​हर हफ्ते चेकिंग क्यों नहीं? नियमानुसार इन अधिकारियों को हर हफ्ते या नियमित अंतराल पर कंपनियों का औचक निरीक्षण करना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि विभाग और कंपनियों के बीच कोई ‘गहरा खेल’ या मिलीभगत चल रही है, जिसके चलते जनता की रगों में जहर घोला जा रहा है।


​डॉक्टर ने लिखी दवा, मरीज ने खाई… पर वो तो ‘कचरा’ निकली!
​एक आम आदमी की लाचारी देखिए। मरीज डॉक्टर के पास जाता है, डॉक्टर पर्ची पर दवा लिख देता है। मरीज अपनी गाढ़ी कमाई खर्च कर मेडिकल स्टोर से दवा खरीदता है इस उम्मीद में कि वह ठीक हो जाएगा। लेकिन उसे क्या पता कि जो बीपी या दिल की दवा वह खा रहा है, वह मानक पर ही खरी नहीं है। डॉक्टर का काम दवा लिखना है, लेकिन दवा असली है या नकली, यह तय करना ड्रग विभाग का काम है, जिसमें वह पूरी तरह फेल साबित हुआ है।


​सिर्फ ‘नोटिस-नोटिस’ का खेल: कई वर्षों से चल रही पुरानी कहानी
​ड्रग अलर्ट आने के बाद विभाग की कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती है। अलर्ट जारी होते ही विभाग संबंधित कंपनी को एक कारण बताओ नोटिस जारी कर देता है। तीन-चार महीने तक नोटिस का जवाब देने और चक्कर काटने का दौर चलता है। इसके बाद अंदरखाने सेटिंग होती है और पिछली कहानी खत्म हो जाती है। इस कागजी खानापूर्ति के बीच जो मरीज अपनी जान गंवा बैठते हैं या जिनकी बीमारी और बिगड़ जाती है, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।


​सख्त एक्शन की जरूरत: ईमानदार अफसरों की रोटेशन हो
​अगर सरकार सच में व्यवस्था परिवर्तन करना चाहती है, तो इन दवा माफियाओं और लापरवाह अफसरों पर सख्त ‘डंडा’ चलाना होगा। कई वर्षों से एक ही जगह पर जमे ड्रग कंट्रोलर और इंस्पेक्टरों का तुरंत प्रभाव से रोटेशन (तबादला) होना चाहिए। जब तक ईमानदार अफसरों को फील्ड में नहीं उतारा जाएगा और घटिया दवा बनाने वालों को जेल नहीं भेजा जाएगा, तब तक जनता की सेहत के साथ यह खिलवाड़ बंद नहीं होगा। विभाग को अब सिर्फ बैच वापस मंगाने की औपचारिकता से आगे बढ़कर आपराधिक मुकदमे दर्ज करने चाहिए।


​ताजातरीन खबरों और तीखे विश्लेषण के लिए हमारे साथ जुड़ें:
​YouTube: पंजाब दस्तक को अभी Subscribe करें
​Facebook: हमारे Page को Follow करें
​WhatsApp: लेटेस्ट न्यूज़ अपडेट्स के लिए हमारे ग्रुप से जुड़ें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *