वरिष्ठ पत्रकार: भेषज
चंबा: बदहाल सड़कें और सरकारी उपेक्षा का दंश
भरमौर-होली मार्ग: बार-बार मरम्मत के दावों के बावजूद यह मार्ग सफर के लिए खतरनाक बना हुआ है। आए दिन मलबे के कारण जाम लगना यहाँ की नियति बन चुका है।
सलूणी स्वास्थ्य केंद्र: सिविल अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। आए दिन मरीज रेफर किए जा रहे हैं, जिससे गरीब जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
डलहौजी पर्यटन: डलहौजी में पार्किंग का कोई स्थाई समाधान नहीं है। पर्यटकों की गाड़ियां घंटों सड़क पर खड़ी रहती हैं, जिससे जाम की समस्या विकराल हो गई है।
चुराह क्षेत्र: क्षेत्र के कई पंचायतों में अभी भी पाइपलाइनें नहीं बिछाई गई हैं। महिलाएं मीलों दूर जाकर प्राकृतिक स्रोतों से पानी लाने को मजबूर हैं।
पांगी की सुध लेने वाला कोई नहीं: जिला मुख्यालय से कटने के बाद पांगी के लिए राशन की आपूर्ति ठप है, प्रशासन ने अभी तक वैकल्पिक स्टॉक की कोई व्यवस्था नहीं की है।
भटियात शिक्षा: स्कूलों में भौतिक विज्ञान और गणित के शिक्षकों के पद सालों से खाली पड़े हैं। शिक्षा विभाग की फाइलों में ये पद भरे हुए दिख रहे हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही है।
लाहौल-स्पीति: विकास की फाइलों में धूल
केलांग बिजली संकट: जिला मुख्यालय होने के बावजूद यहां अघोषित बिजली कटौती आम है। व्यापारियों का कहना है कि इन्वर्टर भी अब जवाब दे रहे हैं।
काजा कनेक्टिविटी: बीएसएनएल और अन्य निजी कंपनियों के टावर अक्सर काम नहीं करते। आपातकालीन स्थिति में भी लोगों को नेटवर्क के लिए पहाड़ों की चोटियों पर जाना पड़ता है।
उदयपुर में पानी का संकट: बर्फ पिघलने के बावजूद पाइपलाइनों में गंदला पानी आ रहा है। फिल्टर प्लांट लगाने की मांग वर्षों से ठंडे बस्ते में है।
साच पास मार्ग: यह मार्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इस पर बीआरओ द्वारा किया जा रहा काम काफी धीमी गति से चल रहा है।
कृषि ऋण: किसानों का आरोप है कि उन्हें समय पर सरकारी सब्सिडी नहीं मिल रही है, जिससे उन्हें साहूकारों से उच्च ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ रहा है।
किन्नौर: आपदा का साया और राजनीतिक उदासीनता
पूह में जलभराव: मानसून से पहले ड्रेनेज सिस्टम ठीक न होने के कारण हल्की बारिश में भी मुख्य बाजार में झील जैसे हालात हो जाते हैं।
भावावैली खनन: अवैध खनन के चलते स्थानीय लोगों के घरों में दरारें आ रही हैं, लेकिन प्रशासन शिकायतों पर मूकदर्शक बना बैठा है।
सांगला बिजली: यहाँ के ट्रांसफार्मर आए दिन फुंक रहे हैं। विभाग के पास स्पेयर पार्ट्स की कमी का बहाना बनाना अब आम हो गया है।
कल्पा अवैध निर्माण: भारी निर्माण कार्यों से भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है। ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेशों का भी यहां खुलकर उल्लंघन हो रहा है।
रिकांगपिओ में रोजगार: स्थानीय युवाओं ने मांग की है कि यहां चल रही जल विद्युत परियोजनाओं में बाहरी लोगों के बजाय स्थानीय बेरोजगारों को प्राथमिकता दी जाए।
पॉलिटिकल अपडेट: अनदेखी का खामियाजा
क्षेत्रीय राजनीति में उबाल है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य सरकार चंबा, लाहौल-स्पीति और किन्नौर जैसे दुर्गम जिलों को केवल चुनाव के दौरान याद करती है। फंड की कमी बताकर विकास कार्यों को रोका गया है, जबकि वीआईपी दौरों पर करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं। स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों ने अब आर-पार की लड़ाई की चेतावनी दी है।
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