ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा
आज 5 जून 2026, शिमला और सोलन की सड़कों पर आम आदमी का दर्द साफ झलका। कैमरे के सामने आने से तो बहुत से ग्रामीण झिझकते हैं, लेकिन कैमरे से हटकर, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए लोगों ने जो राय दी है, वह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। हर तरफ एक ही सवाल है— “क्या हमारा काम सिर्फ वोट डालना है?”
जनता की आवाज: जाम का नर्क और प्रशासनिक नाकामी
लोगों ने आज जिस समस्या पर सबसे ज्यादा आक्रोश जताया, वह है सड़कों पर लगने वाला ‘भयावह जाम’। यह अब केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक यातना बन चुकी है।
घंटों का नर्क: शिमला और सोलन की सड़कों पर लगने वाला जाम इतना विकराल है कि लोगों की आंखों में आंसू तक आ जाते हैं। लोग अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए घंटों एक ही जगह फंसे रहते हैं। शिमला के संजौली, ढली, और सोलन-बद्दी के मुख्य बाजारों में जाम के कारण दम घुटने लगता है।
प्रशासनिक और पुलिस की घोर लापरवाही: जाम का मुख्य कारण सड़कों पर बेतरतीब तरीके से खड़ी गाड़ियां, निजी बसें और स्कूल बसें हैं, जो बीच सड़क पर ही सवारियां चढ़ाती और उतारती हैं। होटल के बाहर गाड़ियों का जमघट और सड़क किनारे खड़े वाहनों पर प्रशासन का कोई अंकुश नहीं है। लोग चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं, “क्या प्रशासन में इतना साहस नहीं है कि वो इन नियमों को तोड़ने वालों पर डंडा चला सके?”
बेबस आम आदमी: बसों में सफर करने वाले बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे घंटों तक इस गर्मी में पसीने से तरबतर होकर जाम में फंसे रहते हैं। उनका क्या कसूर है? यह पूरी तरह से प्रशासनिक नाकामी है। पुलिस सिर्फ चालान काटने तक सीमित है, लेकिन जाम को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।
सड़कों की दुर्दशा और मानसून का खतरा
मानसून सिर पर है, लेकिन सड़कों की हालत बदतर है।
बरसात में तबाही: सड़कों के किनारे जो पुरानी जल निकासी (drainage) व्यवस्था थी, वह अब बंद हो चुकी है। अगर समय रहते इन नालियों और सड़कों की सफाई नहीं की गई, तो बरसात में पूरा पानी सड़कों पर आएगा, जिससे सड़कें फिर से बह जाएंगी। क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है? बद्दी से लेकर शिमला तक की सड़कों की यही दास्तान है।
स्वास्थ्य सेवाओं का बदहाल सच: गरीब जनता कहां जाए?
स्वास्थ्य सेवाओं के मुद्दे पर लोगों का आक्रोश गहरा है:
डॉक्टरों और सफाई का अभाव: स्थानीय अस्पतालों में स्टाफ और डॉक्टरों की भारी कमी है। अस्पतालों में गंदगी का साम्राज्य है—बाथरूम बेहद गंदे हैं, सफाई का कोई नामो-निशान नहीं है।
निजी अस्पतालों की मजबूरी: डॉक्टर न होने और सरकारी अस्पतालों की बदहाली के कारण गरीब मरीजों को भारी-भरकम फीस देकर प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ता है। लोग पूछ रहे हैं, “गरीब जनता कहां जाए? क्या इलाज अब केवल अमीरों के लिए है?”
जनता की आवाज: अब वक्त जवाब मांगने का है
लोगों ने खुलकर कहा है कि अब समय आ गया है कि वे समझें कि ‘वोट’ केवल एक पर्ची नहीं, बल्कि सरकार से सवाल करने का अधिकार है। शिमला और सोलन की जनता अब पांच साल चुप नहीं बैठने वाली। अगर प्रशासन ने जल्द ही ट्रैफिक जाम, पानी की निकासी, सड़कों की मरम्मत और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर काम नहीं किया और चुनावी वादों को धरातल पर नहीं उतारा, तो यह नाराजगी सत्ता के गलियारों में बड़ा बदलाव लाएगी। यह रिपोर्ट उस जनता की आवाज है, जो अब अपने हक का हिसाब मांगना जानती है।
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