बिलासपुर, ऊना और सिरमौर में बढ़ा जनता का आक्रोश

हिमाचल का प्रशासनिक और राजनीतिक महा-मंथन: बिलासपुर, ऊना और सिरमौर की जमीनी रिपोर्ट

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​वरिष्ठ पत्रकार: काजल राणा और मीनाक्षी
​हिमाचल की फिजाओं में इन दिनों विकास और राजनीति का शोर है। बिलासपुर, ऊना और सिरमौर में जहाँ एक ओर चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, वहीं दूसरी ओर आम जनता का प्रशासनिक मशीनरी के प्रति मोहभंग होता दिख रहा है।
​प्रशासनिक शिथिलता: फाइलों में कैद होते दावे
​तीनों जिलों की प्रशासनिक व्यवस्था वर्तमान में ‘कछुआ गति’ से चल रही है।


बिलासपुर: उपायुक्त कार्यालय में लंबित जन शिकायतों का अंबार लगा है। फोरलेन विस्थापितों की मुआवजा फाइलों को महीनों से मंजूरी नहीं मिली है, जिससे सरकारी दावों की पोल खुल रही है।
ऊना: औद्योगिक विकास के दावों के बीच प्रशासनिक मशीनरी स्थानीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ तालमेल बिठाने में विफल रही है। कई क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति का जिम्मा निजी हाथों में जाने से जनता परेशान है।
सिरमौर: गिरिपार क्षेत्र में स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों का निरीक्षण न के बराबर है। दूरदराज के स्कूलों में प्रशासनिक ढिलाई के कारण शैक्षणिक सत्र पिछड़ रहा है।


​राजनीतिक खींचतान: सत्ता और विपक्ष का महा-दंगल
​हालिया चुनावी परिणामों के बाद से दोनों पार्टियों का रुख आक्रामक है:
​कांग्रेस (सत्ता पक्ष): पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ग्रामीण विकास के ‘मिशन’ पर जोर दे रहा है। सुक्खू सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक सुधारों के लिए वे जिला अधिकारियों को सीधे जवाबदेह बना रहे हैं। मंत्रियों के दौरों ने कार्यकर्ताओं में जोश तो भरा है, लेकिन धरातल पर अभी भी बड़े बदलाव की दरकार है।बीजेपी (विपक्ष): जयराम ठाकुर और बीजेपी के अन्य बड़े चेहरे लगातार ‘अव्यवस्था’ का मुद्दा उछाल रहे हैं। पार्टी का कहना है कि सरकार के फैसलों का क्रियान्वयन (Implementation) शून्य है। बीजेपी ने चेतावनी दी है कि यदि सरकारी तंत्र में सुधार नहीं हुआ, तो वे प्रदेशव्यापी आंदोलन की राह अपनाएंगे।


​जनता की पुकार: आर-पार की अपील
​तीनों जिलों की जनता अब प्रशासन से सीधे दो-टूक जवाब मांग रही है:
​सड़कों का जाल: ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि मानसून से पहले सभी लिंक रोड की मरम्मत हो, ताकि बागवानों की फसल समय पर मंडी पहुँचे।
​रोजगार और स्थानीय हक: जल विद्युत परियोजनाओं और उद्योगों में बाहरी लोगों के बजाय स्थानीय युवाओं को 80% आरक्षण की मांग अब एक जन आंदोलन का रूप ले रही है।
​स्वास्थ्य सेवाएं: जनता ने अपील की है कि रेफरल कल्चर बंद हो और हर ब्लॉक के अस्पताल में कम से कम दो विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हों।
​पारदर्शिता: जनता ने उपायुक्तों से आग्रह किया है कि वे महीने में एक बार ‘जनता दरबार’ को औपचारिकता न बनाकर समस्याओं के समाधान (Spot Resolution) का माध्यम बनाएं।


​निष्कर्ष
​प्रशासनिक तंत्र यदि समय रहते नहीं जागा, तो आने वाले समय में जनता का आक्रोश सत्ता समीकरणों को बदलने में देर नहीं करेगा। बिलासपुर, ऊना और सिरमौर की जनता अब केवल खोखले आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है।
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