बी.वॉक कर्मचारियों ने शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर से स्थायी नीति की मांग की

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः: आठ साल की तपस्या के बाद क्या बी.वॉक को मिलेगी मुकम्मल मंजिल? शिक्षा मंत्री के आश्वासन से कर्मचारियों और छात्रों में जगी नई किरण

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​पंजाब दस्तक / विशेष ग्राउंड रिपोर्ट / हमीरपुर
काजल


​“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”
अर्थात—कोई भी कार्य केवल इच्छा करने से नहीं, बल्कि निरंतर परिश्रम और उद्यम से ही सिद्ध होता है।
​हिमाचल प्रदेश के कॉलेजों में चल रहे बैचलर ऑफ वोकेशन (बी.वॉक) कार्यक्रम से जुड़े प्राध्यापकों, गैर-शिक्षक कर्मचारियों और छात्रों ने बीते आठ वर्षों से इसी उद्यम और परिश्रम से प्रदेश के उच्च शिक्षा ढांचे को संवारा है। लेकिन कड़वा सच यह है कि रोजगार और हुनर की बात करने वाला यह महत्वपूर्ण ढांचा आज भी खुद अपनी स्थायी पहचान और स्थायित्व के लिए जद्दोजहद कर रहा है। अब आर-पार की इस लड़ाई में बी.वॉक बिरादरी ने सत्ता के गलियारों में अपनी आवाज इतनी मुखर कर दी है कि सरकार को भी गंभीरता से संज्ञान लेना पड़ा है।


​शिमला की वादियों से लेकर कुल्लू-मंडी की पहाड़ियों तक गूंजी आवाज
पिछले एक हफ्ते में प्रदेश की सियासत और नौकरशाही ने वोकेशनल अमले की जबरदस्त एकजुटता देखी है। शिमला में बी.वॉक संघ के शीर्ष नेतृत्व ने शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के द्वार पर दस्तक देकर इस मुहिम का आगाज किया। इसके बाद जब शिक्षा मंत्री बिलासपुर और घुमारवीं के दौरे पर रहे, तो वहां के प्रतिनिधिमंडल ने उनके सामने जमीनी हकीकत का कच्चा चिट्ठा खोल दिया।


​सिलसिला यहीं नहीं रुका—मंडी प्रवास के दौरान मंडी इकाई के प्रतिनिधियों ने कर्मचारियों के दर्द को साझा किया, तो कुल्लू-मनाली प्रवास के वक्त कुल्लू और हरिपुर महाविद्यालयों के शिष्टमंडल ने शिक्षा मंत्री के समक्ष दो-टूक बात रखी। इस सिलसिलेवार घेराबंदी ने साफ कर दिया है कि अब यह मसला केवल कागजी पत्राचार का नहीं, बल्कि कर्मचारियों के मान-सम्मान और छात्रों के सुरक्षित भविष्य का है।


​डिग्री बांटने की रस्म नहीं, हुनर का असली इम्तिहान है बी.वॉक
वर्ष 2018 में जब हिमाचल में बी.वॉक की नींव रखी गई थी, तब मकसद था पारंपरिक डिग्रियों की लीक से हटकर युवाओं को सीधे उद्योग और रोजगार के लायक बनाना। प्रतिनिधियों ने शिक्षा मंत्री के सामने डंके की चोट पर यह बात रखी कि यह कोर्स केवल किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि युवाओं को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और बाजार की जरूरत के हिसाब से ढालता है। लेकिन विडंबना देखिए—जो शिक्षक हजारों युवाओं का भविष्य संवार रहे हैं, उनकी अपनी सेवा सुरक्षा और निरंतरता आठ साल बाद भी नीतिगत अनिश्चितता के भंवर में फंसी हुई है।


​शिक्षा मंत्री का स्पष्ट भरोसा: “निश्चिंत रहिए, निकालेंगे ठोस रास्ता”
मैराथन मुलाकातों के बाद शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर का रुख बेहद सकारात्मक नजर आया। उन्होंने खुले दिल से स्वीकार किया कि बी.वॉक हिमाचल के सबसे कामयाब रोजगारोन्मुख कार्यक्रमों में से एक है और इससे युवाओं को सीधा लाभ मिला है। शिक्षा मंत्री ने प्रतिनिधियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे पूरी तरह निश्चिंत रहें—सरकार इस पूरे मामले को लेकर बेहद गंभीर है और कार्यक्रम को सुचारू रूप से चलाने तथा कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए नीतिगत समाधान तलाशा जा रहा है।


​अब स्थायी नीति का इंतजार, सेवा निरंतरता पर टिकी निगाहें
शिक्षा मंत्री के इस स्पष्ट और सकारात्मक आश्वासन के बाद पूरे प्रदेश के प्राध्यापकों और गैर-शैक्षणिक कर्मियों में नई उम्मीद की किरण जगी है। प्रतिनिधियों का साफ कहना है कि अब वक्त तदर्थ (ad-hoc) व्यवस्थाओं से आगे बढ़कर एक ठोस और स्थायी नीति बनाने का है। ऐसी नीति—जिससे छात्रों के शैक्षणिक भविष्य के साथ-साथ वर्षों से निष्ठापूर्वक सेवाएं दे रहे कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा और सेवा निरंतरता (service continuity) पूरी तरह पक्की हो सके।
​कर्मचारियों और छात्रों की निगाहें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वादों की यह सकारात्मक पहल कब तक कैबिनेट की मेज से गुजरकर एक स्थायी नीति का रूप लेती है।


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