पंजाब दस्तक | (सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ)
न्यूज़ रूम चंडीगढ़ / नई दिल्ली:
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित नए इक्विटी नियमों (UGC Equity Regulations 2026) को लेकर 5 तारीख को सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी सुनवाई हुई। चूंकि देश की सर्वोच्च अदालत का आदेश संपूर्ण भारतवर्ष के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर समान रूप से लागू होता है, इसलिए इस सुनवाई पर देश के हर विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षण संस्थान, प्राध्यापकों और करोड़ों छात्रों की निगाहें टिकी हुई थीं।
चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ करते हुए अदालत को सूचित किया कि वह इन विवादित नियमों पर पुनः विचार करने और देश भर से आ रही आपत्तियों को दूर करने के लिए एक उच्चस्तरीय समीक्षा समिति (Review Committee) का गठन करने जा रही है।
क्या है मामले की पृष्ठभूमि और विवाद की वजह?
2012 बनाम 2026 के नियम: यूजीसी द्वारा 13 जनवरी 2026 को नए ‘इक्विटी नियम’ लागू किए गए थे। हालांकि, भेदभाव की परिभाषा, शिकायतों के निपटारे और दुरुपयोग की आशंकाओं को लेकर देश भर के परिसरों में भारी बहस छिड़ गई थी।
पहले ही लग चुकी थी रोक: विवाद के चलते सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में ही इन नए नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी और 2012 की पुरानी गाइडलाइंस को लागू रखने का निर्देश दिया था। इसी मुख्य याचिका पर 5 तारीख को अगली महत्वपूर्ण सुनवाई हुई।
5 तारीख की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई का पूरा ब्योरा और अदालती कार्यवाही:
केंद्र सरकार और सॉलिसिटर जनरल का वक्तव्य:
केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च अदालत को बताया कि सरकार का मूल उद्देश्य देश के हर कोने से आने वाले छात्र-छात्राओं के हित की रक्षा करना है। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भारत के किसी भी राज्य, वर्ग या क्षेत्र का छात्र खुद को उपेक्षित या असुरक्षित महसूस न करे। शिक्षाविदों और छात्र संगठनों की ओर से उठाई गई व्यावहारिक समस्याओं को देखते हुए ही एक स्वतंत्र समीक्षा समिति गठित की जा रही है, जो इन नियमों के हर पहलू का नए सिरे से विश्लेषण करेगी।
CJI सूर्यकांत की कड़ी व ऐतिहासिक टिप्पणी:
मामले पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अत्यंत स्पष्ट और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया। CJI ने कहा कि आजादी के 75 से अधिक वर्षों में भारत ने एक जातिविहीन, निष्पक्ष और समतामूलक समाज के निर्माण की दिशा में जो प्रगति की है, उसे किसी भी सूरत में कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।
पीठ ने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि पूर्वोत्तर राज्यों, दक्षिण भारत या देश के किसी भी दूर-दराज के इलाके से आकर पढ़ने वाले विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव, क्षेत्रीय तंज और रैगिंग जैसी सामाजिक बुराइयों को जड़ से मिटाना बेहद जरूरी है। अदालत ने कहा कि गाइडलाइंस ऐसी होनी चाहिए जो पूरे देश के युवाओं और समाज को एक सूत्र में बांधे, न कि शिक्षण संस्थानों के भीतर किसी प्रकार का विभाजन या अविश्वास पैदा करे।
अदालत का अंतिम आदेश और 4 हफ्तों की मोहलत:
सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की दलीलों और समीक्षा समिति के आश्वासन को ऑन-रिकॉर्ड दर्ज किया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई को 4 सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है। अदालत के इस रुख के बाद, जब तक नई समिति अपनी रिपोर्ट पेश नहीं करती, तब तक देश भर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में यूजीसी के वर्ष 2012 के पुराने दिशानिर्देश ही पूरी तरह प्रभावी और लागू रहेंगे।
क्या था याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क?
शीर्ष अदालत में दाखिल याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि 2026 के नए नियमों में शिकायत निवारण व्यवस्था (Grievance Redressal Mechanisms) का ढांचा संतुलित नहीं था। उनका कहना था कि नियमों में पूर्ण स्पष्टता न होने से इनके गलत इस्तेमाल का जोखिम था, जिससे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के सौहार्दपूर्ण माहौल पर असर पड़ सकता था।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई 4 हफ्तों की अवधि के भीतर केंद्र सरकार की समीक्षा समिति अपनी विस्तृत जांच पूरी करेगी और राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य सिफारिशें तैयार कर रिपोर्ट अदालत के सामने रखेगी।
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