शिमला | सुरेंद्र राणा: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की दूरगामी सोच थी कि प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को ‘स्वरोजगार’ से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाए। इसी नेक इरादे से सरकारी विभागों में टैक्सियां अटैच करने की नीति लागू की गई, ताकि हर घर के युवा को काम मिल सके। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री की इस पारदर्शी सोच पर अफसरशाही की मनमानी और फिजूलखर्ची भारी पड़ रही है। सरकारी काम के लिए लगी ये टैक्सियां अब अफसरों के परिवारों की ‘पर्सनल सवारी’ और ‘होम सर्विस’ का जरिया बनकर रह गई हैं।
स्वरोजगार का अपमान: ‘पब्लिक सर्विस’ के बजाय ‘पारिवारिक सैर-सपाटा’
विभागीय कार्यों के लिए अनुबंधित (Attach) इन गाड़ियों का उपयोग अब अफसरों के बच्चों को स्कूल छोड़ने, बाजार से सामान लाने और छुट्टी के दिन रिश्तेदारों को घुमाने के लिए धड़ल्ले से हो रहा है। सवाल यह है कि जब प्रदेश आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है और सरकार बजट बचाने की कोशिश कर रही है, तब अफसरों की इस ‘गाड़ी-लोभी’ मानसिकता और लाखों के पेट्रोल की बर्बादी का बोझ जनता क्यों उठाए?
पारदर्शिता के लिए ‘पंजाब दस्तक’ के माध्यम से जनता के कड़े सुझाव:
शीशे पर विभाग का नाम अनिवार्य: जनता का सुझाव है कि PWD, IPH, वन विभाग, स्वास्थ्य, कृषि, एक्साइज, नगर निगम और DC कार्यालयों की हर गाड़ी के अगले और पिछले शीशे पर विभाग का नाम बड़े अक्षरों में हो। जैसे: “लोक निर्माण विभाग – ऑन ड्यूटी”। इससे गाड़ी की पहचान होगी और सड़क पर चलते हुए हर कोई देख सकेगा कि गाड़ी निजी काम में है या सरकारी।
विभागीय कंट्रोल रूम और GPS: हर विभाग के मुख्यालय में एक ‘डिजिटल कंट्रोल रूम’ स्थापित हो। गाड़ी में GPS लगा हो ताकि विभागाध्यक्ष देख सकें कि अधिकारी गाड़ी में बैठा है या नहीं? गाड़ी ‘साइट’ पर गई है या ‘बाजार’?
छुट्टियों पर ‘व्हीकल लॉक’ नीति: रविवार और सरकारी अवकाशों पर गाड़ियों के आवागमन पर सख्त रोक लगे। अधिकारी अपनी मजबूत तनख्वाह (High Salary) का सम्मान करें और पारिवारिक काम के लिए अपनी निजी गाड़ी और अपने पेट्रोल का इस्तेमाल करें।
ईमानदार अफसरों से लें सीख: प्रशासन में आज भी ऐसे कई खुद्दार अधिकारी हैं जिनके पास सरकारी गाड़ी नहीं है, फिर भी वे अपने बच्चों को निजी खर्च पर पढ़ा रहे हैं। तो फिर गाड़ी वाले अफसर सरकारी तेल पर डाका क्यों डाल रहे हैं?
मुख्यमंत्री की दूरदर्शी सोच का हो सम्मान
हिमाचल की जनता और पंजाब दस्तक यह मांग करते हैं कि मुख्यमंत्री की युवाओं को रोजगार देने वाली नीति का मजाक न उड़ाया जाए। इन ‘अटैच’ टैक्सियों का उपयोग केवल जनहित के कार्यों के लिए होना चाहिए। अफसर सरकार का ‘पार्ट एंड पार्सल’ हैं, उन्हें चाहिए कि वे सरकारी संसाधनों का उपयोग एक ईमानदार ट्रस्टी के रूप में करें।
हिमाचल की जनता अब एक-एक गाड़ी और एक-एक लीटर पेट्रोल का हिसाब चाहती है। अगर इन गाड़ियों पर विभाग का नाम और GPS नहीं लगा, तो अफसरों की यह ‘पारिवारिक ऐयाशी’ कभी बंद नहीं होगी।
