पंजाब दस्तक ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा — संकट मोचन महावीर घाटी”मैं बोलता हूँ तो इल्जाम है बगावत का, पर चुप रहूँ तो बेबसी मार देती है”: ₹142 शुल्क और हाउस टैक्स देने के बाद भी गंदगी में रहने को मजबूर महावीर घाटी के शिमला
शिमला: राजधानी के संकट मोचन क्षेत्र की महावीर घाटी में सफाई व्यवस्था के नाम पर जनता से मज़ाक किया जा रहा है। पिछले कई दिनों से क्षेत्र में कूड़ा न उठाए जाने के कारण स्थिति नारकीय हो गई है। यहाँ के लगभग 200 परिवारों के घरों के भीतर कूड़ा सड़ रहा है और सड़कों पर पुराने कचरे के ढेर लग चुके हैं।जनता दे रही टैक्स, फिर ये बदहाली क्यों?स्थानीय निवासियों का सवाल सीधा और तीखा है—यहाँ का हर परिवार कूड़ा उठाने के लिए प्रति माह ₹142 का शुल्क देता है, इसके अलावा हाउस टैक्स भी भरा जाता है। टैक्स लेने के बावजूद कई-कई दिनों तक कूड़ा न उठाना प्रशासन और संबंधित कंपनी की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। क्या पूरे शिमला में यही हाल है या सिर्फ महावीर घाटी के साथ यह सौतेला व्यवहार किया जा रहा है?स्वच्छ भारत का सपना या कागजी दावा?एक तरफ ‘स्वच्छ भारत’ का ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर सफाई व्यवस्था पूरी तरह ठप है। डंगों के किनारे उगी घास और सड़कों पर आवारा कुत्तों द्वारा फैलाया जा रहा कचरा बीमारियों को न्योता दे रहा है।जब इस बदहाली के खिलाफ आवाज़ उठाई जाती है, तो इसे ‘बगावत’ कह दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि एक पत्रकार अपने पड़ोसियों और 200 परिवारों की इस बेबसी पर चुप कैसे रहे? जिस कंपनी को सफाई का जिम्मा दिया गया है, उस पर अभी तक कार्यवाही क्यों नहीं हुई? प्रशासन को जवाब देना होगा कि जनता का पैसा लेने के बाद उन्हें गंदगी के ढेर पर क्यों छोड़ा गया है।
