केंद्रीय बजट में रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट खत्म करना छोटे राज्यों के खिलाफ, हिमाचल के लिए आज काला दिवस – सीएम सुक्खू

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शिमला, सुरेंद्र राणा; हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने केंद्रीय बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए आज के दिन को हिमाचल के इतिहास में काला दिवस करार दिया है। सीएम सुक्खू ने कहा कि केंद्रीय बजट में रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (RDG) को समाप्त करना छोटे और पहाड़ी राज्यों के हितों के खिलाफ है।रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट समाप्त करना संघीय ढांचे की भावना के विपरीत है। राज्य सरकार इस मुद्दे पर संवैधानिक व कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी और लड़ाई लड़ेगी।16वें वित्त आयोग के तहत यदि रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट दी जाती है तो करीब 50 हजार करोड़ रुपए की RDG हिमाचल को मिलेगी लेकिन RDG को ही समाप्त कर दिया गया, जिसकी जानकारी पहले नहीं थी। सुक्खू ने कहा कि छोटे राज्य कभी भी पूर्ण रूप से राजस्व सरप्लस नहीं हो सकते। उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने RDG के मुद्दे पर प्रदेश के हितों की मजबूती से पैरवी नहीं की। हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। प्रदेश का केवल करीब 10 प्रतिशत क्षेत्र औद्योगिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध है, जबकि जीएसटी लागू होने के बाद राज्य के कर अधिकार भी सीमित हो गए हैं।फार्मास्युटिकल और अन्य उद्योगों से मिलने वाला राजस्व प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स का हवाला देते हुए कहा कि इससे प्रदेश के बागवानों को नुकसान हो रहा है। न्यूजीलैंड से सेब आयात पर आयात शुल्क घटाए जाने से स्थानीय बागवान प्रभावित हुए हैं। मुख्यमंत्री ने मनरेगा का जिक्र करते हुए कहा कि यह योजना पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की सोच की देन थी और यह मांग आधारित रोजगार योजना थी, जिसने कोरोना काल में लाखों लोगों को सहारा दिया लेकिन उसमें भी बदलाव कर केंद्र सरकार ने लोगों के साथ कुठाराघात किया है।सीएम सुक्खू ने कहा कि 2023-24 में प्रदेश ने अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया। राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से प्रभावित परिवारों की मदद की, लेकिन केंद्र से सहायता बहुत देर से और बेहद कम मिली। दो साल बाद केवल 1,500 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई, जिसमें से भी वास्तविक रूप से लगभग 1,000 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं।मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश उत्तर भारत का “वॉटर टॉवर” है, जहां से प्रमुख नदियां निकलती हैं। प्रदेश ने 15,000 मेगावॉट से अधिक जलविद्युत क्षमता विकसित की है, लेकिन इसके बावजूद राज्य को उसके संसाधनों का उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिन जलविद्युत परियोजनाओं की लागत पूरी हो चुकी है, उनमें राज्य की हिस्सेदारी बढ़ाई जानी चाहिए।

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