नई दिल्ली।जातिगत भेदभाव से जुड़े विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। बुधवार को शीर्ष न्यायालय ने याचिका को सूचीबद्ध करने की मंजूरी दी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नए नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायत निवारण जैसी संवैधानिक सुरक्षा से वंचित किया जा रहा है। साथ ही नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग भी की गई है।याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमें पता है कि क्या हो रहा है। यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी कमियों को दूर किया जाए। हम इसे सूचीबद्ध करेंगे।”उधर, यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है। यूपी और बिहार में बुधवार को भी व्यापक प्रदर्शन देखने को मिला। यूपी के पीलीभीत में सवर्ण समाज के युवाओं ने विरोध स्वरूप मुंडन कराया, जबकि बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के पोस्टरों पर कालिख पोती गई।हरियाणा में इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए हैं। एक पूर्व भाजपा विधायक ने नए नियमों की खुलेआम आलोचना की, वहीं दो मौजूदा विधायक भी इन नियमों से असंतुष्ट नजर आए। दूसरी ओर, बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूजीसी के नए नियमों का समर्थन किया है।
यूजीसी के नए नियमों को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इन नियमों को पूरी तरह असंवैधानिक बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की।कलराज मिश्र ने कहा कि पहले 2012 की गाइडलाइंस के तहत एससी-एसटी के मामलों में शिकायत का प्रावधान था और अब ओबीसी को भी इसमें जोड़ा गया है, लेकिन उनकी राय में जाति के आधार पर अलग-अलग प्रावधान करने की बजाय सभी वर्गों को समान अधिकार मिलने चाहिए। साथ ही उन्होंने झूठी शिकायतों पर दंडात्मक प्रावधान न होने को भी गंभीर खामी बताया।अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यूजीसी के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगेगी या नहीं।
