हमीरपुर, उमांशी राणा। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की नशे के खिलाफ सोच अत्यंत स्पष्ट और सख्त है। मुख्यमंत्री का मानना है कि नशा हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा खतरा है और वह इसे प्रदेश से जड़ से मिटाने के लिए पूरी तरह संकल्पित हैं। मुख्यमंत्री की इस गंभीर सोच और उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति के बावजूद, उनके अपने गृह जिले हमीरपुर में प्रशासनिक सक्रियता की कमी एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है।मुख्यमंत्री सुक्खू की नशे के प्रति चिंता उनकी हर नीति और संबोधन में झलकती है। वह स्वयं इसी मिट्टी से जुड़े हैं और हमीरपुर के युवाओं को नशे की दलदल से बचाकर एक सुरक्षित भविष्य देना चाहते हैं। परंतु, जिले में नशे की निरंतर बढ़ती धमक प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। क्या कारण है कि जब सूबे के मुखिया की सोच नशे के खिलाफ इतनी सख्त है, तो उनके अपने जिले का अमला नशे के सौदागरों के नेटवर्क को जड़ से उखाड़ने में क्यों पीछे है?एक तरफ मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हमीरपुर जिला विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। नादौन में पर्यटन और जल क्रीड़ा (रिवर राफ्टिंग) के नए द्वार खुल रहे हैं, तो सुजानपुर की ऐतिहासिक विरासत को संवारने के लिए करोड़ों के बजट का प्रावधान किया गया है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हमीरपुर अग्रणी बन रहा है। लेकिन इस चमकते विकास के बीच नशे का काला कारोबार एक गहरे दाग की तरह है, जिसे मिटाना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।हमीरपुर की जनता अब प्रशासन से खोखले दावों की नहीं, बल्कि ठोस नतीजों की मांग कर रही है। जब मुख्यमंत्री स्वयं इस मुद्दे पर इतनी गंभीर सोच रखते हैं, तो उनके अपने गृह जिले में प्रशासनिक ढिलाई अक्षम्य है। पंजाब दस्तक यह स्पष्ट करता है कि यदि समय रहते नशा माफिया की कमर नहीं तोड़ी गई, तो यह न केवल प्रशासन की नाकामी होगी बल्कि मुख्यमंत्री के ‘नशा मुक्त हिमाचल’ के विजन के साथ भी बड़ा खिलवाड़ होगा। अब वक्त आ गया है कि अधिकारी मुख्यमंत्री की मंशा को समझें और धरातल पर अपराधियों में कानून का खौफ पैदा करें ताकि एक सुरक्षित और नशा मुक्त हमीरपुर का सपना साकार हो सके।
