त्रिपुरा बैलेट पेपर चुनाव में NDA की जीत

बैलेट पेपर पर भी ‘हाथ’ खाली! त्रिपुरा में मतपत्रों से हुए चुनाव में एनडीए का प्रचंड परचम, 4320 सीटों पर कब्जा, कांग्रेस मात्र 14 पर सिमटी

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पंजाब दस्तक
​नई दिल्ली (विशेष ब्यूरो प्रमुख, राज शर्मा):


देश की राजनीति में हर चुनावी हार के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर सवाल खड़े करने और ‘वोट चोरी’ का राग अलापने वाले विपक्षी दलों को पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा से बहुत बड़ा सियासी झटका लगा है। मतपत्र (बैलेट पेपर) की बहाली को लोकतंत्र की एकमात्र कसौटी बताने वाली कांग्रेस उसी बैलेट पेपर के चुनाव में धराशायी हो गई है। त्रिपुरा में मतपत्रों और आधिकारिक पार्टी चुनाव चिह्नों पर हुए विलेज कमेटी चुनावों में जनता ने कांग्रेस को पूरी तरह नकारते हुए एनडीए गठबंधन की झोली में एकतरफा जीत डाल दी है।


​पार्टी सिंबल पर हुआ घमासान: कमल और मोथा के आगे ‘हाथ’ पस्त
त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (TTAADC) के तहत 587 विलेज कमेटियों की कुल 4,594 सीटों पर चुनाव आयोग द्वारा मतपत्रों के जरिए चुनाव कराए गए थे। इसमें सभी मान्यता प्राप्त दल अपने आधिकारिक चुनाव चिह्नों पर मैदान में उतरे थे। कांग्रेस अपने पारंपरिक ‘हाथ’ के निशान पर और भाजपा ‘कमल’ के निशान पर लड़ी थी।


​परिणाम सामने आते ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई। सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)—जिसमें टिपरा मोथा और भाजपा शामिल हैं—ने 4,320 सीटों पर ऐतिहासिक कब्जा जमा लिया। टिपरा मोथा को 3,428 सीटें और भाजपा को 859 सीटें मिलीं। वहीं दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी अपने सिंबल पर चुनाव लड़कर महज 14 सीटों पर सिमट गई। यहां तक कि निर्दलीय उम्मीदवारों ने 173 सीटें जीतीं, जो कि कांग्रेस की सीटों से कई गुना अधिक हैं।


​अब किस पर फूटेगा हार का ठीकरा?
राजधानी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस नतीजे के बाद तीखी बहस छिड़ गई है। हरियाणा और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद लगातार ईवीएम में गड़बड़ी और वोट चोरी का नैरेटिव गढ़ने वाले विपक्ष से अब सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं। सवाल यह है कि जहां न कोई मशीन थी, न कोई चिप और न ही कोई तकनीकी प्रणाली, वहां जनता ने कांग्रेस के सिंबल को क्यों खारिज कर दिया? क्या अब मतपत्रों में भी धांधली का बहाना तलाशा जाएगा?


​पंजाब से हिमाचल तक सियासी असर
त्रिपुरा के इन परिणामों की गूंज उत्तर भारत के राज्यों—विशेषकर पंजाब और हिमाचल प्रदेश में भी सुनाई दे रही है। इन राज्यों में कांग्रेस और विपक्षी दल लगातार यह नैरेटिव बनाते रहे हैं कि यदि बैलेट पेपर से निष्पक्ष मतदान हो तो नतीजे पूरी तरह बदल जाएंगे। लेकिन त्रिपुरा के इस जनादेश ने यह साबित कर दिया है कि चुनाव परिणाम ईवीएम या बैलेट पेपर से तय नहीं होते, बल्कि जनता के भरोसे और राजनीतिक विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं।


​राजनीतिक जानकारों का मानना है कि त्रिपुरा में मतपत्रों से मिले इस परिणाम ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के उस सबसे बड़े तर्क की हवा निकाल दी है, जिसके सहारे हर विफलता का ठीकरा चुनावी मशीनों पर फोड़ा जाता रहा है।
​देखते रहें ‘पंजाब दस्तक’

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