IPS संजीव गांधी को कांगड़ा निगम का MD नियुक्त किया गया

सड़कों पर पसीना बहाने वाले ‘वन मैन आर्मी’ IPS संजीव गांधी को मिला कांगड़ा निगम का जिम्मा: ‘2 मिनट ट्रैफिक प्लान’ के जनक, ईमानदार छवि के DIG को क्यों किया गया साइडलाइन?

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​विशेष पड़ताल | पंजाब दस्तक | सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ
​शिमला/कांगड़ा:


हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की पेचीदा और जाम से जूझती सड़कों को अपनी दूरगामी सोच से रफ्तार देने वाले 2012 बैच के तेज-तर्रार आईपीएस अधिकारी संजीव कुमार गांधी को आखिरकार लंबी प्रतीक्षा के बाद नई तैनाती मिल गई है। प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग ने अधिसूचना जारी कर उन्हें हिमाचल प्रदेश पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम (कांगड़ा) का प्रबंध निदेशक (MD) नियुक्त किया है। अब वह कांगड़ा मुख्यालय में अपनी सेवाएं देंगे और आईएएस विनय कुमार को इस अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर दिया गया है।


​चलो, एक राहत की बात यह जरूर है कि हफ्तों से कार्मिक विभाग के ‘वेटिंग फॉर पोस्टिंग’ के ठंडे पूल में बिना किसी महकमे के बैठे इस डीआईजी रैंक के सीनियर अफसर को आखिरकार पोस्टिंग तो मिली। लेकिन सवाल यह है कि कहां मिली और क्यों मिली? जिस जांबाज पुलिस अफसर का पूरा जीवन फील्ड पुलिसिंग, अपराध नियंत्रण और जनता के सीधे सरोकारों में बीता, उसे फाइलों और ऋण वितरण वाले एक निगम में धकेलने के फैसले ने समूचे प्रशासनिक व सियासी गलियारों में सुलगते सवाल खड़े कर दिए हैं।


​एसी कमरों में नहीं, सड़कों पर उतरकर लिखी व्यवस्था सुधार की इबारत
​आईपीएस संजीव कुमार गांधी की पहचान एक ऐसे अधिकारी की रही है जो अपनी पब्लिसिटी या मीडिया कैमरों के मोहताज नहीं रहे। वह मीडिया की चकाचौंध से कोसों दूर रहकर खामोशी से अपना काम करने में यकीन रखते हैं। शिमला के पुलिस अधीक्षक (SP) रहते हुए उन्होंने जो काम किया, वह आज भी राजधानी के लोग याद करते हैं:
​’2 मिनट का विश्राम’ और क्रांतिकारी ट्रैफिक प्लान: शिमला जैसे पहाड़ी शहर में जहां जाम पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए नासूर बन चुका था, वहां गांधी ने खुद जमीनी स्तर पर उतरकर ‘2 मिनट हॉल्ट/विश्राम’ का अनूठा ट्रैफिक प्लान लागू किया। इस फॉर्मूले ने शिमला की लाइफलाइन को जाममुक्त कर देश भर में सुर्खियां बटोरीं।


​खुद सड़क पर उतरने वाले एसपी: राजधानी में बर्फबारी हो, वीआईपी मूवमेंट हो या भारी टूरिस्ट सीजन, संजीव गांधी कभी बंद कमरों या केबिन में बैठकर हुक्म चलाने वाले अफसर नहीं रहे। उनका अधिकांश समय सड़कों पर ट्रैफिक सुचारू करवाने और जवानों का हौसला बढ़ाने में बीतता था।
​ईमानदार और बेदाग छवि: नशा माफिया और अपराधियों पर सीधी चोट करने वाले गांधी की पहचान एक बेहद ईमानदार, सख्त और समझौता न करने वाले खाकी वर्दीधारी के रूप में रही है।


​फिर डीआईजी बनने के बाद किसके शिकार हुए गांधी?
​जब ऐसे ईमानदार और काबिल अफसर को डीआईजी (DIG) रैंक पर पदोन्नत किया गया, तो प्रदेश की जनता को उम्मीद थी कि सरकार उनके तजुर्बे का उपयोग प्रदेश में कानून-व्यवस्था सुधारने, ड्रग्स माफिया की कमर तोड़ने या किसी बड़ी पुलिस रेंज की कमान सौंपने में करेगी।


​लेकिन हकीकत इसके उलट रही:
​अफसरशाही की गुटबाजी और रंजिश: प्रशासनिक गलियारों में यह बात किसी से छिपी नहीं है कि गांधी की सीधी, बेबाक और किसी के आगे न झुकने वाली कार्यशैली सचिवालय और पुलिस मुख्यालय की कई ताकतवर लॉबियों को हजम नहीं होती थी।
​पूल में अटकाकर कांगड़ा रवानगी: डीआईजी रैंक के अफसर को पहले लंबे समय तक बिना पोस्टिंग के पूल में बिठाए रखना और फिर सीधा शिमला के सत्ता केंद्र से दूर कांगड़ा में एक गैर-कैडर वित्तीय निगम का एमडी बना देना, साफ दर्शाता है कि उन्हें मुख्यधारा की पुलिसिंग से अलग-थलग करने की रणनीति पर काम हुआ।


​जनहित और कैडर पर उठते गहरे सवाल
​जनता और पुलिस महकमे के भीतर आज एक ही चर्चा है—जब राज्य को नशे और बढ़ते अपराधों से निपटने के लिए संजीव गांधी जैसे दबंग और निष्ठावान अफसरों की सड़कों पर सख्त जरूरत है, तब उन्हें कांगड़ा में निगम की कुर्सी पर बैठाना व्यवस्था की कैसी विडंबना है?
​खैर, देर से ही सही, पोस्टिंग तो मिली, मगर इस फैसले ने हिमाचल की अफसरशाही और अंदरूनी धड़ेबाजी के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है जहां काबिलियत और ईमानदारी अक्सर गुटबाजी के चक्रव्यूह में उलझ कर रह जाती है।


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