हिमाचल में डेपुटेशन रद्द होने के बाद कर्मचारियों की मेडिकल ग्राउंड पर राहत की मांग

डेपुटेशन पर हाईकोर्ट का हंटर: मनपसंद कुर्सियों पर टिके रहने के लिए ‘बीमारी’ का सहारा, क्या सुखविंदर सरकार साधेगी नियमों और संवेदनाओं में संतुलन?

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​पंजाब दस्तक | वरिष्ठ पत्रकार काजल, शिमला
​हिमाचल प्रदेश में सरकारी महकमों के भीतर वर्षों से मलाईदार पदों पर कुंडली मारकर बैठे कर्मचारियों और अधिकारियों की नींद हराम हो चुकी है। हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) तुरंत रद्द करने के फरमान के बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा है। अब सुगम और पसंदीदा स्टेशनों से विदाई के डर से कई अफसर और मुलाजिम ‘मेडिकल ग्राउंड’ का कवच तलाशने में जुट गए हैं। सचिवालय से लेकर मंत्रियों की चौखट तक खुद की या परिजनों की कथित गंभीर बीमारियों के पर्चे थमाकर मौजूदा तैनाती बरकरार रखने की जोरदार पैरवी की जा रही है।


​अदालत का डंडा, कार्मिक विभाग का सख्त रुख
हाईकोर्ट की दो-टूक फटकार के बाद कार्मिक विभाग ने सभी बोर्डों, निगमों और सरकारी विभागों में चल रही अवैध प्रतिनियुक्तियां खत्म करने का आदेश थमाया था। साफ निर्देश हैं कि बरसों से डेपुटेशन की आड़ में मनचाही जगह डटे कर्मचारियों को तत्काल अपने मूल कैडर और तयशुदा स्टेशन पर लौटना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम महकमों से ही करीब 2500 कर्मियों की रवानगी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।


​कागजी खानापूर्ति पर नकेल: DDO की तस्दीक बिना नहीं मिलेगी सैलरी
सिस्टम में ‘कागजों पर कहीं और, टेबल कहीं और’ वाले खेल को खत्म करने के लिए सरकार ने नकेल कसी है। संबंधित डीडीओ (DDO) को अब लिखित हलफनामा देना होगा कि कर्मचारी ने उसी स्टेशन पर भौतिक रूप से काम किया है जहां उसका मूल पद है। बायोमेट्रिक और जमीनी हाजिरी की पुष्टि के बिना वेतन का एक भी बिल पास नहीं होगा।


​सच्ची मजबूरी बनाम रसूख का खेल: सरकार के सामने दोहरी परीक्षा
अब सबसे बड़ा पेंच उन अर्जियों पर फंसा है जो मानवीय और चिकित्सीय आधार पर लगाई जा रही हैं। सरकार के सामने एक तरफ अदालत की अवमानना से बचने और नियमों का कड़ाई से पालन कराने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ वास्तव में गंभीर रूप से बीमार कर्मियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने का इम्तिहान।


​सियासी और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या मानवीय आधार की आड़ में रसूखदार कर्मियों को पसंदीदा कुर्सियों पर बनाए रखने का ‘चोर दरवाजा’ खुला रहेगा, या फिर सरकार पारदर्शी मापदंड तय कर दूध का दूध और पानी का पानी करेगी? आने वाले चंद दिनों में सरकार की नीति से यह साफ हो जाएगा कि राहत का पैमाना हकीकत है या महज बहानेबाजी।


​पंजाब दस्तक की अपील:
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