शिमला जिला परिषद चुनाव में सियासी उलटफेर

​शिमला ZP चुनाव: मीडिया में परेड कराने वालों के उड़े होश! सत्ता, प्रशासन और ‘गुप्त गेम प्लान’ से बदली पूरी बाजी

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विशेष रिपोर्ट (पंजाब दस्तक)
ब्यूरो चीफ: सुरेंद्र राणा


शिमला। “कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क”—राजनीति के इस सबसे घिनौने और बेनकाब चेहरे को देखना हो, तो शिमला जिला परिषद चुनाव की इस उठापटक को समझ लीजिए। चंद दिन पहले मीडिया के कैमरों के सामने जिन नवनिर्वाचित सदस्यों की परेड कराकर अपनी जीत का ढोल पीटा जा रहा था, आज वही ‘मोहरे’ पाला बदलकर दूसरे खेमे में खड़े नजर आ रहे हैं।


​अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद की कुर्सी पर काबिज होने के लिए जो सियासी बिसात बिछाई गई थी, वह चुनाव से ठीक पहले पूरी तरह पलट गई है। भाजपा खेमे में सीधी सेंधमारी और दो नवनिर्वाचित सदस्यों के अचानक सत्ता के गलियारे में एंट्री करने से विरोधी खेमे की नींद उड़ चुकी है।


​बंद कमरे की सीक्रेट मीटिंग: कहां, कैसे और क्यों बदला पाला?
​पंजाब दस्तक को मिली ग्राउंड जीरो की जानकारी के मुताबिक, इस पूरे सियासी उलटफेर की पटकथा रविवार को अत्यंत गोपनीय तरीके से लिखी गई।
​कहां हुई मुलाकात? दोनों नवनिर्वाचित सदस्यों को कड़ी सुरक्षा और पूरी गोपनीयता के बीच शिमला स्थित मुख्यमंत्री आवास (‘ओक ओवर’) ले जाया गया।


​कैसे बनी बात? सूत्रों के अनुसार, पर्दे के पीछे सत्ता और संगठन के कद्दावर महारथियों ने मोर्चा संभाला। क्षेत्र के विकास कार्यों की गारंटी, जिला परिषद में मनचाही तवज्जो और प्रशासनिक सहयोग के वादों के साथ यह ‘डील’ पक्की की गई।
​क्यों बदला मन? विपक्ष दावा करता रहा कि उनके पास पूर्ण बहुमत है, लेकिन सदस्यों की इस अचानक मुलाकात ने साफ कर दिया कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
​तीखा सवाल: जो नेता कल तक मीडिया के सामने हाथ उठाकर एक साथ खड़े थे, आखिर ऐसा क्या हुआ कि रातों-रात उनका रुख बदल गया? क्या यह सिर्फ विकास का मोह है या सत्ता का सीधा दबाव?


​मूकदर्शक बना प्रशासन: क्या निष्पक्ष चुनाव पर उठ रहे सवाल?
​इस पूरे सियासी नाटक के बीच स्थानीय प्रशासन का रवैया भी गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है।
​सुरक्षा व्यवस्था या पहरेदारी? जिला परिषद सदस्यों की हलचल और बैठकों को लेकर प्रशासन की जो तटस्थता दिखनी चाहिए थी, वहां पूरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ है।


​विपक्ष का आरोप: राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि प्रशासनिक अमला भी इस पूरी जोड़-तोड़ में मूकदर्शक बनकर सत्ताधारी खेमे को मौन समर्थन दे रहा है। सदस्यों पर किसी भी तरह का अनुचित दबाव न बने, यह सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन वर्तमान हालात निष्पक्षता की धज्जियां उड़ाते दिख रहे हैं।


​सन्नाटे में भाजपा, अब ऊंट किस करवट बैठेगा?
​इस सेंधमारी के बाद से भाजपा खेमे में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है। वरिष्ठ नेता मीडिया के तीखे सवालों से बचते नजर आ रहे हैं। 25 सदस्यों वाली जिला परिषद में एक-एक वोट के लिए आर-पार की जंग छिड़ी हुई है।
​अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अपने बचे हुए कुनबे को समेट पाएगी या सत्ता के प्रभाव के आगे शिमला जिला परिषद की कुर्सी हाथ से निकल जाएगी?


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