पंजाब दस्तक
सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक (शिमला/चंबा)
एसडीएम कोर्ट के फैसले के बाद खुली पोल, 601 वोट पाकर भारती ठाकुर बनीं वैध प्रधान; सिर्फ पंजाब दस्तक ही नहीं, बल्कि पूरा चंबा और समूचा हिमाचल पूछ रहा है तीखे सवाल—क्या पहली गिनती में आंखें बंद थीं या किसी के दबाव में बदला गया था जनादेश? क्या दोषी अमले पर गिरेगी गाज?
चंबा: हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा अंतर्गत विकास खंड सलूणी की ग्राम पंचायत ठाकरी मट्टी का चुनावी परिणाम अब केवल हार-जीत का आंकड़ा नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था और चुनाव प्रक्रिया पर बड़ा सवालिया निशान बन गया है। 26 मई को संपन्न हुए पंचायत चुनाव के चार महीने बाद जब एसडीएम कोर्ट के आदेश पर दोबारा मतपेटियां खुलीं, तो पूरी तस्वीर ही बदल गई।
पहली गिनती के बाद जिस संतोष कुमारी को ‘विजेता’ घोषित कर प्रधान पद की जिम्मेदारी दी गई थी, वह री-काउंटिंग में 44 वोटों से हार गईं। वहीं, पहले रनर-अप रहीं भारती ठाकुर को 601 मतों के साथ विधिवत रूप से ग्राम पंचायत प्रधान घोषित कर दिया गया। बीडीओ सलूणी कमर सिंह ने ऑन-कैमरा पूरे घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि एसडीएम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत गठित तीन सदस्यीय प्रशासनिक कमेटी (सीडीपीओ, एसईपीओ और जेई) की निगरानी में यह पुनर्मतगणना पूरी की गई।
आंकड़ों का आईना: 4 महीने पहले क्या दिखाया और अब क्या निकला?
26 मई का पहला घोषित परिणाम:
संतोष कुमारी: 597 वोट (विजेता घोषित)
भारती ठाकुर: 561 वोट (पराजित घोषित)
अवैध मत: 5, नोटा: 4
(संतोष कुमारी को 36 वोटों से आगे दिखाकर विजेता घोषित किया गया था)
री-काउंटिंग के बाद का प्रमाणित परिणाम:
भारती ठाकुर: 601 वोट (वास्तविक विजेता)
संतोष कुमारी: 557 वोट (पराजित)
अवैध मत: 5, नोटा: 4 (यथावत)
अंतिम परिणाम: भारती ठाकुर 44 वोटों से विजयी
चंबा और पूरे हिमाचल के सीधे सवाल: जनता पूछ रही है—क्यों हुई ऐसी अंधेरगर्दी?
यह सवाल केवल एक पंचायत का नहीं है। आज सलूणी से लेकर पूरे चंबा और हिमाचल की जनता सीधे तौर पर प्रशासन से यह तीखे सवाल पूछ रही है:
चंबा की जनता का सीधा सवाल—किसके इशारे पर हुआ यह खेल?
26 मई को पहली मतगणना के समय तैनात अमला क्या कर रहा था? 44 वोटों का अंतर कोई सामान्य मानवीय भूल नहीं हो सकता। जनता पूछ रही है कि क्या किसी दबाव या मिलीभगत के तहत वास्तविक जनादेश को दबाया गया था?
पूछता है हिमाचल—क्या वहां मौजूद पोलिंग एजेंटों की आंखों में धूल झोंकी गई?
जब पहली बार गिनती पूरी हुई, तब काउंटिंग हॉल में क्या चल रहा था? क्या मतपत्रों के बंडलों में जानबूझकर हेरफेर की गई? अगर हां, तो उस वक्त जिम्मेदार अफसरों ने संज्ञान क्यों नहीं लिया?
सीधा सवाल—जनता के 4 महीनों के नुकसान का जिम्मेदार कौन?
ठाकरी मट्टी पंचायत के मतदाताओं ने गांव के विकास के लिए मतदान किया था। जिसे जनता ने 44 वोटों की स्पष्ट बढ़त से चुना, उसे 4 महीने तक इंसाफ के लिए भटकना पड़ा। वहीं दूसरी तरफ, दूसरा प्रत्याशी 4 महीने तक प्रधानी करता रहा। इस प्रशासनिक चूक और जनता के साथ हुए धोखे की भरपाई कौन करेगा?
चंबा और हिमाचल पूछ रहा है—दोषी अफसरों पर कब होगी कार्रवाई?
क्या प्रशासन इसे केवल ‘री-काउंटिंग’ बताकर मामला रफा-दफा कर देगा? 26 मई को पहली गिनती करने वाले जिम्मेदार स्टाफ पर अब तक विभागीय जांच और सख्त कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कैसे बहाल होगा?
जनता की अदालत: आपकी क्या है राय?
यह ठाकरी मट्टी की जनता के हक और निष्पक्ष व्यवस्था का सवाल है।
क्या पहली मतगणना करने वाले लापरवाह कर्मचारियों पर तुरंत सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए? आखिर किसके कहने पर हुआ था यह उलटफेर?
अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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