विशेष रिपोर्ट: उमांश, वरिष्ठ पत्रकार, पंजाब दस्तक (धर्मशाला)
हिमाचल प्रदेश (विशेष ब्यूरो): हिमाचल प्रदेश की ग्राम पंचायतों में सत्ता हस्तांतरण और शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर चल रहा लंबा प्रशासनिक इंतजार अब पूरी तरह समाप्त हो गया है। कांगड़ा जिले में भी नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों की ओथ सेरेमनी (शपथ ग्रहण समारोह) संपन्न होने के साथ ही अब प्रदेश के सभी 12 जिलों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का चक्र पूरा हो गया है।
अब पूरे हिमाचल प्रदेश के सभी 12 जिलों में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव और शपथ ग्रहण का काम मुकम्मल होने के बाद, आगामी 27 जून को होने वाली पहली बैठक से सूबे की सभी पंचायतों में चुनी हुई सरकारें पूरी ताकत से काम करना शुरू कर देंगी। इस ऐतिहासिक दिन से प्रदेश भर के सभी नवनिर्वाचित प्रधान और उप-प्रधान अपनी संवैधानिक, प्रशासनिक और वित्तीय (फाइनेंशियल) शक्तियों का उपयोग कर सकेंगे। इसके साथ ही पंचायत स्तर पर विकास कार्यों, भुगतान प्रक्रियाओं और प्रशासनिक निर्णयों में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
इतना ही नहीं, 27 जून को पहली बैठक आयोजित होने के साथ ही प्रदेश भर के 31,182 नवनिर्वाचित पंचायती राज जनप्रतिनिधि मानदेय (Honorarium) प्राप्त करने के भी पात्र हो जाएंगे।
जानिए कितना मिलेगा मानदेय और बैठक भत्ता:
सुक्खू सरकार द्वारा बजट में निर्धारित नए प्रावधानों के अनुसार, राज्य के नवनिर्वाचित ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों को मिलने वाला मासिक मानदेय और बैठक भत्ता इस प्रकार है:
ग्राम पंचायत प्रधान: ₹7,500 प्रति माह
ग्राम पंचायत उप-प्रधान: ₹5,100 प्रति माह
ग्राम पंचायत सदस्य (वार्ड पंच): ₹1,050 प्रति बैठक (बैठक भत्ता)
इसके अलावा पंचायत समितियों (BDC) और जिला परिषद के नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों का मानदेय भी तय है:
जिला परिषद अध्यक्ष: ₹25,000 प्रति माह | उपाध्यक्ष: ₹19,000 प्रति माह | सदस्य: ₹8,500 प्रति माह
पंचायत समिति (BDC) अध्यक्ष: ₹12,000 प्रति माह | उपाध्यक्ष: ₹9,000 प्रति माह | सदस्य: ₹7,500 प्रति माह
5 महीने की देरी से सरकार के खजाने में बचे करोड़ों रुपये, उठे सवाल
हिमाचल प्रदेश में पंचायतों का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो गया था। इसके बाद चुनाव और प्रशासनिक औपचारिकताओं में करीब 5 महीने की देरी हुई। राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इस बात की भी खूब चर्चा है कि वित्तीय संकट से जूझ रही प्रदेश सरकार को इस देरी से क्या कोई वित्तीय लाभ हुआ है?
देखा जाए तो इन 5 महीनों के दौरान नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल औपचारिक रूप से शुरू नहीं हुआ था, जिससे सरकार को त्रि-स्तरीय पंचायती राज के सभी 31,182 प्रतिनिधियों को दिए जाने वाले मानदेय और भत्तों का भुगतान नहीं करना पड़ा।
लगभग कितना पैसा बचा?
एक अनुमान के मुताबिक, सिर्फ ग्राम पंचायत स्तर पर ही 4,600 प्रधानों और 4,600 उप-प्रधानों के मानदेय (क्रमशः ₹7,500 और ₹5,100) को मिला दिया जाए, तो हर महीने करीब ₹5.80 करोड़ की बचत होती है। 5 महीनों के हिसाब से यह आंकड़ा अकेले शीर्ष पंचायत पदाधिकारियों के लिए ही लगभग ₹29 करोड़ बैठता है। यदि इसमें सभी वार्ड पंचों के बैठक भत्ते, जिला परिषद और बीडीसी (BDC) के सैकड़ों सदस्यों के मानदेय को भी शामिल कर लिया जाए, तो राज्य सरकार को कुल मिलाकर करीब ₹30 से ₹35 करोड़ रुपये की अनुमानित बचत हुई है।
अब पूरे हिमाचल के 9,200 प्रतिनिधियों के हाथ में होगी मुहर की ताकत
कांगड़ा जिले में आज हुए शपथ ग्रहण के बाद अब पूरे हिमाचल प्रदेश का आंकड़ा पूरी तरह साफ हो गया है। सभी 12 जिलों को मिलाकर अब प्रदेश के कुल 9,200 नवनिर्वाचित पंचायत प्रधानों और उप-प्रधानों को एक साथ वित्तीय अधिकार और सरकारी मुहर का इस्तेमाल करने की शक्ति मिलने जा रही है। गांव के विकास कार्यों से लेकर पंचायत स्तर के प्रशासनिक निर्णय तक अब इन चुने हुए प्रतिनिधियों की भूमिका पूरी तरह सक्रिय होने वाली है।
नियमों के अनुसार, प्रधान और उप-प्रधान की मुहरें कोई अन्य बाहरी व्यक्ति नहीं बना सकता। अगर कोई ऐसा अनाधिकृत प्रयास करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी केस दर्ज होने का प्रावधान है।
अबकी बार स्थिति अलग: रिटायर्ड बीडीओ राजेंद्र सिंह तेजटा का विश्लेषण
इस बार की पंचायती राज व्यवस्था और प्रशासनिक देरी पर सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) बीडीओ राजेंद्र सिंह तेजटा का कहना है कि अब से पहले पंचायती चुनाव हमेशा समय पर होते रहे हैं। अमूमन ऐसी व्यवस्था रहती थी कि पिछला कार्यकाल समाप्त होने तक नवनिर्वाचित प्रधान और उप-प्रधान शपथ ले चुके होते थे। जैसे ही पिछली पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होता था, तो एक या दो दिनों के भीतर ही पहली बैठक आयोजित हो जाती थी और प्रधान व उप-प्रधान अपना कार्यभार संभाल लेते थे, जिसके तुरंत बाद मुहर का उपयोग शुरू हो जाता था।
लेकिन इस बार स्थिति बिल्कुल अलग है। प्रधान और उप-प्रधानों की पहली मीटिंग चुनाव और शपथ के करीब एक महीने बाद (27 जून को) होने जा रही है। हालांकि, चूंकि प्रधानों और उप-प्रधानों ने अब पद की शपथ ले ली है, इसलिए वे मुहर का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पूर्व के अनुभवों को साझा करते हुए विकास खंड रोहरू की ग्राम पंचायत भढारनू के पूर्व प्रधान दिलीप कुमार गौतम ने बताया कि वर्ष 2021 में 17, 19 और 21 जनवरी को तीन चरणों में मतदान संपन्न हुआ था। पंचायत वार्ड सदस्य और उप-प्रधान के परिणाम मतदान वाले दिन ही घोषित कर दिए गए थे, जबकि 22 जनवरी को पंचायत समिति और जिला परिषद के नतीजे आए थे। उन्होंने 23 जनवरी 2021 को प्रधान पद की शपथ ग्रहण की थी और उसके मात्र चार दिनों के भीतर ही पहली बैठक आयोजित कर पंचायत की आधिकारिक मुहर का इस्तेमाल शुरू कर दिया था।
जानिए क्या हैं नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों की शक्तियां:
1. प्रशासनिक शक्तियां:
ग्राम पंचायत और ग्राम सभा की बैठकें बुलाना और उनकी अध्यक्षता करना।
पंचायत के दिन-प्रतिदिन के कामकाज और तैनात कर्मचारियों पर सामान्य निगरानी रखना।
गांवों में विकास कार्यों जैसे सड़क, पानी, सफाई और स्ट्रीट लाइट के क्रियान्वयन की सीधी देखरेख करना।
2. वित्तीय शक्तियां (Financial Powers):
पंचायत निधि से जुड़े चेक और भुगतान (पेमेंट) दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करना।
ग्रामीण विकास योजनाओं और वार्षिक बजट को मंजूरी देना।
स्वीकृत वित्तीय सीमा के भीतर विकास कार्यों पर खर्च करना।
3. न्यायिक व नियामक शक्तियां:
गांव में सार्वजनिक स्थानों से अतिक्रमण और न्यूसेंस (उपद्रव) हटाने का आदेश जारी करना।
भवन निर्माण पर नियंत्रण रखना और सामान्य प्रशासनिक आदेश जारी करना।
पंचायत स्तर पर कर (टैक्स) व शुल्क की वसूली करना।
कुछ छोटे आपराधिक और सिविल मामलों में ग्राम पंचायत की न्यायिक समिति का हिस्सा बनना।
4. सरकार और गांव के बीच की मजबूत कड़ी:
मनरेगा (MGNREGA) और स्वच्छ भारत मिशन जैसी केंद्र व राज्य सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं को धरातल पर लागू करवाना।
ग्राम सभा द्वारा की गई सिफारिशों को पंचायत के सामने रखना और राज्य सरकार तक गांव की प्रमुख मांगों व समस्याओं को पहुंचाना।
अभी जारी है बीडीओ कमेटियों की व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश में पंचायतों का पिछला कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त होने के बाद, राज्य सरकार ने ग्राम पंचायतों के संचालन के लिए अस्थाई प्रशासनिक समितियां गठित की हैं। इसमें ग्राम पंचायत स्तर पर संबंधित खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है और पंचायत सचिव इस समिति के सदस्य-सचिव के रूप में कार्यरत हैं। यह समितियां ही वर्तमान में पंचायतों के नियमित प्रशासनिक और आवश्यक कार्य देख रही हैं, जो 27 जून को पहली बैठक के साथ ही नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों को कार्यभार सौंप देंगी।
प्रमाण पत्रों को लेकर नियमों में स्पष्ट व्याख्या न होने के बावजूद, अब स्थिति साफ होने के बाद प्रधान और उप-प्रधान सर्टिफिकेट जारी करते समय अपनी मुहर का प्रयोग कर सकते हैं। हालांकि, 27 जून से पहले जारी इन सर्टिफिकेट्स को स्वीकार करना या न करना उच्च अधिकारियों के विवेक पर निर्भर रहेगा।
रिपोर्ट: उमांश, वरिष्ठ पत्रकार, पंजाब दस्तक।
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