विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
शिमला। हिमाचल प्रदेश के सरकारी विभागों में पिछले 15 से 17 वर्षों से लगातार निष्ठा और ईमानदारी से सेवाएं दे रहे आउटसोर्स कर्मचारियों की स्थिति अत्यंत दयनीय और चिंताजनक बनी हुई है। जीवन के स्वर्णिम वर्ष सरकारी तंत्र को समर्पित करने के बाद भी इन कर्मचारियों को केवल नाममात्र का वेतन थमाया जा रहा है, जो इनके साथ घोर अन्याय है।
सबसे दुखद और दर्दनाक पहलू यह है कि इस अवधि के दौरान कर्तव्य निभाते हुए कई आउटसोर्स कर्मचारी ऑन-ड्यूटी शहीद हो चुके हैं। कई बुजुर्ग माताएं अपने जवान बेटों को खो चुकी हैं, कई धर्मपत्नियों के सुहाग उजड़ गए और मासूम बच्चे बेसहारा पीछे छूट गए। अपनी जवानी, दिन-रात की मेहनत और अपने परिवार के भविष्य को दांव पर लगाकर प्रदेश के विकास में योगदान देने वाले इन कर्मचारियों के हाथ आज केवल शोषण, अनिश्चितता और उपेक्षा ही लगी है।
सरकारी को OPS का सुरक्षा कवच, आउटसोर्स के भाग्य में सिर्फ अनिश्चित भविष्य!
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि पक्का सरकारी कर्मचारी पूरे मान-सम्मान के साथ नौकरी करता है, पूरा वेतन पाता है, बात-बात पर हड़ताल का अधिकार रखता है और सेवानिवृत्ति के बाद OPS (पुरानी पेंशन योजना) की गारंटीशुदा सामाजिक सुरक्षा पाता है।
लेकिन दिन-रात पसीना बहाने वाला आउटसोर्स कर्मचारी हर पल इस डर में जीता है कि कल उसके और उसके परिवार का क्या होगा?
लाखों लेने वालों से ज्यादा मेहनत, पर वेतन चौथा हिस्सा भी नहीं: जो काम लाखों रुपये सैलरी लेने वाला सरकारी कर्मचारी करता है, वही काम आउटसोर्स कर्मचारी नौकरी जाने के डर से दोगुने समर्पण के साथ करता है। फिर भी उसे वेतन का चौथा हिस्सा भी नसीब नहीं होता।
महंगाई में अच्छा खाना और बच्चों की पढ़ाई सपना: नाममात्र मानदेय के कारण यह कर्मचारी न अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पा रहा है और न ही परिवार को पौष्टिक खाना।
उम्र ढलने पर कहाँ जाएँगे ये कर्मचारी?: जब शरीर में ताकत नहीं रहेगी, बाल-बच्चे बड़े हो जाएँगे और उम्र ढल जाएगी—तब यह आउटसोर्स कर्मचारी कहाँ जाएगा? ना ड्यूटी के दौरान पूरा सहारा, ना सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन का सहारा! जब कोई पेंशन नहीं होगी, तो बुढ़ापे की लाठी कौन बनेगा?
15-17 साल का समर्पण, शहादत और सरकारी उपेक्षा
पूर्व में रही सरकारों के मंत्रियों से लेकर वर्तमान सरकार तक, किसी ने भी इस शोषित वर्ग के लिए आज तक कोई ठोस और स्थायी निर्णय नहीं लिया है।
दिन-रात मेहनत, पर अधिकार शून्य: सचिवालय से लेकर निदेशालय, स्वास्थ्य, PWD, जल शक्ति, वन, खाद्य एवं आपूर्ति, शहरी विकास, एक्साइज, राजस्व और DC कार्यालयों तक—हर जगह व्यवस्था यही कर्मचारी संभाल रहे हैं।
मानसिक टॉर्चर और ब्लैकमेलिंग: आपात स्थिति में छुट्टी मांगने पर वेतन काट लिया जाता है। निजी ठेका कंपनियां कुछ साठगांठ वाले अफसरों के दम पर जबरन दस्तखत कराने और नौकरी से निकालने की धमकियां दे रही हैं।
25 अगस्त को शिमला में महाआंदोलन, 3 मुख्य मांगें
इसी अन्याय और शोषण के खिलाफ हुंकार भरते हुए आउटसोर्स कर्मचारी महासंघ ने 25 अगस्त को राजधानी शिमला में महाआंदोलन का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। 70 हजार से अधिक आउटसोर्स कर्मचारी शिमला में एक मंच पर जुटकर अपनी 3 प्रमुख मांगें रखेंगे:
ठेकेदारी प्रथा का अंत व स्थायी नीति: आउटसोर्स व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर 15-17 वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों के लिए तुरंत ठोस ‘स्थाई नीति’ (Permanent Policy) बनाई जाए।
समाजिक व आर्थिक सुरक्षा (बीमा व पेंशन प्रावधान): बुढ़ापे और भविष्य की सुरक्षा के लिए बीमा एवं पेंशन/पॉलिसी जैसे पुख्ता इंतजाम किए जाएँ।
जबरन दस्तखत व टॉर्चर पर रोक: कंपनियों द्वारा जबरन स्वीकृति पत्रों पर साइन कराने की तानाशाही, नौकरी से निकालने की धमकी और समय पर वेतन न देने पर तुरंत सख्त कार्रवाई हो।
आगामी रणनीति: अब पानी सिर से ऊपर
कर्मचारियों का स्पष्ट कहना है कि अब केवल आश्वासनों का समय खत्म हो चुका है। यदि सरकार ने 25 अगस्त से पहले उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करते हुए ठोस कदम नहीं उठाया, तो शिमला की सड़कों पर होने वाला यह जनव्यापी आंदोलन उग्र रूप लेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
विशेष अपील (पंजाब दस्तक):
आउटसोर्स कर्मचारियों के इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे को जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस रिपोर्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
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