इलाहाबाद, भारत में नैतिक तौर पर सास-ससुर की सेवा करना उनकी पुत्रवधू यानी बहू का कत्र्तव्य माना जाता है। कई परिवारों में देखा जाता है कि बेटे के गुजरने के बाद भी विधवा बहू अपने सास-ससुर की देखभाल करती हैं और उनका खर्चा उठाती हैं, लेकिन अब ऐसे मामलों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नया फैसला सुनाया है। कोर्ट की तरफ से कहा गया कि बहू के ऊपर अपने सास-ससुर के भरण पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती है। हाई कोर्ट ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि नैतिक जिम्मेदारी चाहें कितनी भी जरूरी और मजबूत क्यों न हो, उसे कानूनी जिम्मेदारी में नहीं बदला जा सकता। जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा कि बीएनएस की धारा 144 के तहत बहू को सास-ससुर का खर्च उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय कानून के तहत सास-ससुर भरण-पोषण के दायरे में नहीं आते हैं। ऐसे में बहू को उनका खर्च उठाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। विधायिका ने अपनी समझ के अनुसार सास-ससुर को इस प्रावधान में शामिल नहीं किया है। इसका मतलब साफ है कि कानून बनाते समय भी इस बात को ध्यान में रखा गया था कि बहू के ऊपर सास-ससुर का खर्चा उठाने की जिम्मेदारी न आए।
