पंजाब दस्तक,विस्फोटक: हिमाचल विधानसभा में ‘बहुमत’ का दबदबा या ‘लोकतंत्र’ की अनदेखी? बिना चर्चा और बिना प्रतियों के करोड़ों का बजट पास!विधानसभा परिसर
विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफशिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा में आज सप्लीमेंट्री बजट (अनुपूरक अनुदान मांगें) पारित होने के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने संसदीय परंपराओं पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। हालांकि सरकार के पास सदन में पूर्ण बहुमत है और बजट का पास होना तय था, लेकिन जिस तरह से बिना किसी सार्थक चर्चा और बिना समय पर प्रतियां उपलब्ध कराए करोड़ों के बजट पर मुहर लगी, उसने विपक्ष को आगबबूला कर दिया है।जयराम ठाकुर का सरकार पर ‘डिजिटल’ प्रहारनेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने विधानसभा परिसर में पत्रकारों से रूबरू होते हुए सरकार की कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ाईं। उन्होंने कहा— “हैरानी की बात है कि इतने महत्वपूर्ण बजट की कॉपियां न तो पोर्टल पर समय से अपलोड की गईं और न ही विधायकों को हार्ड कॉपी दी गई। जब बजट पास होने वाला था, तब तक हमारे पास कोई दस्तावेज नहीं था। क्या अब डिजिटल इंडिया के नाम पर विपक्ष की आवाज दबाई जाएगी?”सुरेंद्र राणा का तीखा विश्लेषण: “बहुमत है तो चर्चा से डर क्यों?”‘पंजाब दस्तक’ के विश्लेषण के अनुसार, जब सरकार के पास संख्या बल पूरा है, तो विपक्ष को बोलने का मौका देने में परहेज क्यों? सप्लीमेंट्री बजट जैसी महत्वपूर्ण वित्तीय प्रक्रिया पर चर्चा न होना और विधायकों को अध्ययन के लिए समय न देना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। डिजिटल प्रणाली अच्छी है, लेकिन यह जमीनी हकीकत से दूर नहीं होनी चाहिए; हर विधायक कंप्यूटर का विशेषज्ञ नहीं होता, उन्हें कागज पर दस्तावेज मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है।सदन में ‘हंगामा’ और ‘हड़बड़ी’शोर-शराबे और विपक्ष के कड़े विरोध के बीच जिस तरह से करोड़ों के आंकड़ों को ध्वनि मत से पारित किया गया, उसे संसदीय भाषा में ‘गुलोटिन’ कहा जाता है। सत्ता पक्ष ने इसे विकास की जरूरत बताया, लेकिन विपक्ष इसे सरकार की ‘तानाशाही’ और वित्तीय आंकड़ों को छिपाने की कोशिश करार दे रहा है।
