शिमला, सुरेंद्र राणा: नगर निगम शिमला की मासिक बैठक में मेयर के कार्यकाल को लेकर जमकर हंगामा हुआ। बैठक शुरू होने से पहले ही भाजपा पार्षदों ने मेयर के सदन संचालन पर सवाल उठाए। भाजपा पार्षद सरोज ठाकुर ने कहा कि मेयर के कार्यकाल को बढ़ाने वाले विधेयक पर अभी तक राज्यपाल के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, ऐसे में वे किस नियम के तहत पद पर बने हुए हैं।इस मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस पार्षदों के बीच तीखी नारेबाजी और बहस हुई। हंगामे के बीच भाजपा पार्षदों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया। कुछ देर बाद मेयर ने कांग्रेस पार्षदों के साथ दोबारा बैठक शुरू की, लेकिन विपक्ष ने फिर विरोध जताया।भाजपा पार्षदों ने कांग्रेस को महिला विरोधी करार देते हुए कहा कि ढाई साल बाद रोस्टर के अनुसार मेयर पद महिला के लिए आरक्षित होना था, लेकिन वर्तमान मेयर पद पर बने हुए हैं। इसी दौरान मेयर ने कृष्णानगर वार्ड के भाजपा पार्षद बिट्टू कुमार पाना को सदन की कार्यवाही बाधित करने के आरोप में दो माह के लिए निलंबित कर दिया।भाजपा पार्षदों का कहना है कि मेयर को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है और उन्हें पार्षद को निलंबित करने का भी अधिकार नहीं है।
मेयर सुरेंद्र चौहान ने आरोपों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि भाजपा पार्षद बेवजह हाउस में हंगामा कर रहे हैं और बिट्टू कुमार पाना लगातार कार्यवाही में बाधा डाल रहे थे, जिसके चलते उन्हें दो माह के लिए निलंबित किया गया। उन्होंने बताया कि कार्यकाल बढ़ाने से संबंधित विधेयक दूसरी बार विधानसभा से पारित होकर राज्यपाल के पास भेजा गया है। नगर निगम हाउस में कांग्रेस और मनोनीत पार्षदों ने प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल से बिल पर शीघ्र हस्ताक्षर करने का आग्रह किया है।मेयर ने यह भी बताया कि बैठक में शहर से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर चर्चा के बाद उन्हें पारित किया गया। अगले माह से नगर निगम पूरी तरह पेपरलेस प्रणाली पर काम करेगा और सभी पार्षदों को टैब उपलब्ध कराए जाएंगे।
मेयर के कार्यकाल विस्तार के मामले पर 2 मार्च को अदालत में सुनवाई निर्धारित है।याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत से मेयर की नियुक्ति तत्काल रद्द करने की मांग की है। सरकार ने मेयर का कार्यकाल ढाई वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष करने संबंधी अध्यादेश राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा था, जिसकी अवधि 6 जनवरी को समाप्त हो चुकी है। मेयर का ढाई साल का कार्यकाल 14 नवंबर को पूरा हो गया था और रोस्टर के अनुसार इसके बाद यह पद महिला के लिए आरक्षित था। इसी मुद्दे को लेकर सदन में तीखा विवाद देखने को मिला।
