सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के आदेश मानने से इनकार

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सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे विवाद में भारत ने अपना रुख और स्पष्ट कर दिया है। भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (कोर्ट a आर्बिट्रेशन) के आदेशों को मानने से साफ इनकार कर दिया है। भारत का कहना है कि यह अदालत अवैध रूप से गठित की गई है और इसके किसी भी आदेश को वह मान्यता नहीं देता।दरअसल, हेग स्थित इस मध्यस्थता अदालत ने भारत को निर्देश दिया था कि वह अपने जलविद्युत परियोजनाओं—विशेष रूप से बगलिहार और किशनगंगा परियोजनाओं—के परिचालन रिकॉर्ड और पोंडेज लॉगबुक पेश करे, ताकि आगे की सुनवाई में इनका उपयोग किया जा सके। अदालत ने नौ फरवरी 2026 तक इन दस्तावेजों को सौंपने या फिर अनुपालन न करने की स्थिति में औपचारिक स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है।हालांकि, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस पूरी प्रक्रिया की वैधता को नहीं मानता और न ही इन कार्यवाहियों में हिस्सा लेगा। भारत का कहना है कि पाकिस्तान इस मुद्दे पर बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा लेकर ‘कोर्ट-कोर्ट का खेल’ खेल रहा है, जबकि भारत का रुख शुरू से ही साफ और स्थिर रहा है।सरकारी सूत्रों के मुताबिक, भारत सिंधु जल संधि के प्रावधानों के तहत तय वैकल्पिक तंत्रों के अनुसार ही किसी भी विवाद का समाधान मानता है और इसी दायरे में रहकर आगे बढ़ेगा।

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