पंजाब दस्तक,विशेष संपादकीय: यूजीसी (UGC) के विवादित नियमों पर उत्तर भारत में कोहराम, सवर्ण समाज और प्रशासनिक अधिकारियों का सामूहिक विद्रोह

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विशेष विस्तृत रिपोर्ट: ब्यूरो की कलम से

दिल्ली/चंडीगढ़/शिमला: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ ने पूरे उत्तर भारत में एक ऐसा सामाजिक तूफ़ान खड़ा कर दिया है, जिसे संभालना अब सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है। यह विवाद अब पंजाब और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर उत्तर प्रदेश के जिलों और हिमाचल की वादियों तक एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।दिल्ली, यूपी और हिमाचल में आक्रोश की गूंजदेश की राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गए हैं। यूपी के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा देना इस बात का प्रमाण है कि सरकारी तंत्र के भीतर भी सवर्ण समाज के प्रति हो रहे भेदभाव को लेकर जबरदस्त असंतोष है। वहीं हिमाचल की राजधानी शिमला में प्रबुद्ध नागरिकों ने सवाल उठाया है कि आखिर सवर्ण समाज के हितों की अनदेखी कब तक होगी?स्मार्ट पीढ़ी और जनता के तीखे सवालक्षेत्र के विश्लेषण में यह बात प्रमुखता से उभरी है कि आज के बच्चे और विद्यार्थी बहुत ‘स्मार्ट’ हैं। वे पुरानी जातिगत बेड़ियों को नहीं जानते और मानते हैं कि “हम सब बराबर हैं”। लेकिन यूजीसी के नियम उन्हें वापस बांटने का काम कर रहे हैं। लोग पूछते हैं कि जब राष्ट्र निर्माण और टैक्स अदायगी में सवर्ण समाज की हिस्सेदारी सबसे अग्रणी है, तो फिर न्याय करने वाली कमेटियों में उन्हें दरकिनार क्यों किया जा रहा है?जनता की पुरजोर मांग: सरकार तुरंत करे हस्तक्षेपआम जनता की यह पुरजोर मांग है कि भारत सरकार को इस अत्यंत संवेदनशील मामले में तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। लोगों का स्पष्ट कहना है कि ऐसे ‘काले कानून’, जो समाज में दरार पैदा कर रहे हैं, उन पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए ताकि भविष्य में समाज में किसी भी तरह के दंगे-प्रसाद या आपसी टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो। लोगों का तर्क है कि सरकार को इस समूची व्यवस्था पर दोबारा गंभीरता से विचार करना चाहिए और नियम ऐसे बनाने चाहिए, जिनमें समाज के हर वर्ग को समान सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित हो।निष्कर्ष: न्याय की पुकार और भारत सरकार से अपीलआज देश का हर जागरूक नागरिक न्याय की पुकार कर रहा है। जनता की स्पष्ट मांग है कि भारत सरकार इस पूरे विवादित विषय पर गंभीरता से पुनर्विचार करे और इस विवाद को सुलझाने के लिए सार्थक कदम उठाए। यूजीसी को अपनी गरिमा बचाने के लिए इन नियमों पर पुनः मंथन करना ही होगा। भारत सरकार से यह अपेक्षा है कि वह इस सामाजिक असंतोष को समझते हुए नियमों में पारदर्शिता लाए, ताकि न्याय का तराजू सबके लिए बराबर रहे और किसी भी वर्ग के साथ पक्षपात न हो।

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