संपादक: पंजाब दस्तक की कलम से[नई दिल्ली | लखनऊ | शिमला | चंडीगढ़]विशेष विश्लेषण: चुनावी सर्वे की ‘हवाई बाजीगरी’ बनाम 10 राज्यों की जमीनी हकीकत—क्या UGC का ‘काला कानून’ बनेगा भाजपा के लिए 2027 का राजनीतिक काल?मोदी सरकार के दावों और विपक्ष की ‘दोहरी नीति’ के बीच फंसा सवर्ण समाज, हिमाचल से लेकर यूपी तक सुलग रही है ‘स्वर्ण विद्रोह’ की चिनगारी।दिल्ली के आलीशान स्टूडियो में बैठकर जो सर्वेक्षक भाजपा को ‘अजेय’ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, वे शायद उत्तर भारत की सुलगती ज़मीन की तपिश महसूस नहीं कर पा रहे हैं। जनवरी 2026 के ताज़ा MOTN (Mood of the Nation) सर्वे के आंकड़ों पर गौर करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ, जो कभी 75% के पार था, अब गिरकर 55% के आसपास ठहर गया है। यह गिरावट मामूली नहीं है, क्योंकि यह सीधे तौर पर उस सवर्ण समाज के भरोसे का टूटना है, जिसने भाजपा को सत्ता के शिखर पर बैठाया था। सत्ता का असली फैसला 2029 में नहीं, बल्कि 2026 और 2027 के विधानसभा चुनावों में होगा।1. हिमाचल का ‘विस्फोट’ और मोदी का गिरता ग्राफहिमाचल प्रदेश, जहाँ सवर्ण आबादी 50% से अधिक है, वहां भाजपा के लिए स्थितियां अब पहले जैसी नहीं रहीं। UGC रेगुलेशन 2026 के बाद सवर्ण समाज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।शिमला से धर्मशाला तक ललकार: इस ‘काले कानून’ के विरोध में धर्मशाला, हमीरपुर और ऊना के युवा सड़कों पर हैं। हिमाचल के सवर्णों के बीच भाजपा की लोकप्रियता में आई 4-5% की सीधी गिरावट दिल्ली के रणनीतिकारों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।मिशन 2027 पर संकट: अगर हिमाचल का सवर्ण ‘नोटा’ (NOTA) की ओर मुड़ा, तो 2027 में कमल का मुरझाना तय है।2. उत्तर प्रदेश: ब्राह्मण-राजपूत गठजोड़ की ‘खामोश’ सुनामीयूपी की राजनीति का केंद्र माने जाने वाले ब्राह्मण और ठाकुर समाज में UGC के ‘काले कानून’ को लेकर भीषण गुस्सा है।विपक्ष का ‘डबल गेम’: सपा, बसपा और कांग्रेस इस समय एक शातिर ‘दोहरी रणनीति’ पर चल रहे हैं। ये दल अभी इसलिए चुप हैं ताकि दलित-पिछड़ा वोट बैंक न भड़के, लेकिन अंदरूनी तौर पर ये सवर्णों को भाजपा के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं। विपक्ष का प्लान है कि जैसे ही इलेक्शन डिक्लेअर होंगे, वे सवर्णों के बीच जाकर कहेंगे—”देखो, तुम्हारे रक्षक ने ही तुम्हारे साथ विश्वासघात किया!”3. UGC बिल 2026: सवर्णों के लिए ‘विनाशकारी’ प्रावधान13 जनवरी 2026 को लागू हुए इस कानून ने शिक्षित सवर्ण वर्ग में भारी असुरक्षा पैदा कर दी है। सवर्ण समाज इसे ‘डेथ वारंट’ कह रहा है क्योंकि:सुरक्षा कवच का अंत: झूठी शिकायत करने वालों पर सज़ा का प्रावधान हटाना सवर्णों के साथ सरासर ‘विश्वासघात’ है।सुप्रीम कोर्ट का स्टे: हालांकि कोर्ट ने इस पर 30 जनवरी 2026 को रोक (Stay) लगा दी है, लेकिन सवर्ण समाज इसे सरकार की ‘नीति और नीयत’ में खोट मान रहा है। उन्हें ‘टेंपरेरी स्टे’ नहीं, इस कानून की पूरी वापसी चाहिए।निष्कर्ष: संपादकीय खरी-खरीआज सवर्ण समाज खुद को दो पाटों के बीच पिसा हुआ महसूस कर रहा है—एक तरफ सत्ता पक्ष का ‘काला कानून’ है, तो दूसरी तरफ विपक्ष की ‘दोहरी नीति’ और अवसरवाद। राजनीति आंकड़ों की बाजीगरी से नहीं, बल्कि जनभावनाओं के सम्मान से चलती है।पंजाब दस्तक का विश्लेषण साफ है—मोदी सरकार का गिरता ग्राफ कोई सामान्य घटना नहीं है। अगर सवर्णों ने ‘इंतकाम’ का बटन दबाया, तो दिल्ली के सारे हवाई सर्वे धरे के धरे रह जाएंगे।
