पंजाब दस्तक: विशेष समाचार॥ सुरेंद्र राणा ॥॥ हिमाचल को केंद्र की ‘कठोर’ संजीवनी: 545 करोड़ मंजूर, पर शर्तों के घेरे में सुक्खू सरकार; चूके तो कटेगा बजट हिमाचल
प्रदेश की भारी आर्थिक तंगी के बीच केंद्र सरकार ने राज्य को 545 करोड़ रुपये की विशेष वित्तीय सहायता जारी कर दी है। पूंजीगत निवेश (Capital Investment) के लिए मिली यह राशि प्रदेश की थमी हुई विकास परियोजनाओं में जान फूंकेगी। हालांकि, इस बार दिल्ली ने केवल मदद ही नहीं भेजी है, बल्कि वित्तीय अनुशासन को लेकर ऐसी ‘कड़ी शर्तें’ भी लगाई हैं, जिसने सचिवालय से लेकर सियासी गलियारों तक हलचल तेज कर दी है।15वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर कड़ा पहरायह धनराशि 15वें वित्त आयोग की उन सिफारिशों के तहत जारी की गई है, जो सीधे तौर पर ‘परफ़ॉर्मेंस’ और पारदर्शिता से जुड़ी हैं। केंद्र ने साफ कर दिया है कि यह पैसा केवल उन्हीं प्रोजेक्ट्स पर खर्च होगा जो राज्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत करेंगे। अब राज्य को हर पाई का हिसाब ‘यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट’ के जरिए तय समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य होगा।लापरवाही पर ‘ब्याज’ का डंडा और बजट कटौती का अल्टीमेटमकेंद्र का रुख इस बार अभूतपूर्व रूप से सख्त है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों में कहा गया है कि:10 दिन की डेडलाइन: राशि प्राप्त होने के 10 कार्यदिवस के भीतर इसे संबंधित एजेंसियों को जारी करना होगा।ब्याज की वसूली: यदि बजट को सरकारी खजाने में बिना खर्च किए ‘होल्ड’ किया गया, तो राज्य को बाजार दर पर ब्याज चुकाना होगा।सीधी कटौती: किसी भी प्रकार के उल्लंघन या फंड के ‘डायवर्जन’ की स्थिति में, केंद्र भविष्य में राज्य को मिलने वाले टैक्स शेयर (Tax Devolution) से इस राशि की रिकवरी कर लेगा।सियासी वार-पलटवार: आमने-सामने भाजपा-कांग्रेसइस खबर के बाद प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई है।विपक्ष (भाजपा) का प्रहार: भाजपा ने इसे सरकार की वित्तीय साख पर अविश्वास बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि “केंद्र को ये कठोर शर्तें इसलिए लगानी पड़ीं क्योंकि राज्य सरकार विकास की राशि को अपनी ‘गारंटियों’ और फिजूलखर्ची में उड़ा रही है। यह सरकार की कार्यप्रणाली पर दिल्ली का ‘रेड कार्ड’ है।”सत्ता पक्ष (कांग्रेस) का पलटवार: दूसरी ओर, सरकारी हल्कों में इसे संघीय ढांचे पर दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि “हिमाचल एक आपदा प्रभावित राज्य है और केंद्र को शर्तों के बजाय उदारता दिखानी चाहिए। यह राज्य के विकास की राह में रोड़े अटकाने की कोशिश है।”प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्र अब ‘मॉनिटरिंग मोड’ में है। 31 मार्च की डेडलाइन नजदीक है और सुक्खू सरकार के पास अपनी प्रशासनिक दक्षता साबित करने के लिए बहुत कम समय बचा है। अब देखना यह होगा कि इन कड़ी शर्तों के बीच राज्य सरकार इस भारी-भरकम राशि का कितना प्रभावी इस्तेमाल कर पाती है।ऐसी ही सटीक और विश्वसनीय खबरों के लिए ‘पंजाब दस्तक’ को फॉलो करें और सब्सक्राइब करें।
