पंजाब दस्तक: विशेष विश्लेषणसुरेंद्र राणा॥ विश्लेषण: दिल्ली के नियमों की ‘दोहरी कसौटी’—सहयोगियों को राहत, विरोधियों पर आफत? ॥शिमला/दिल्ली: राजनीति में कहा जाता है कि “नियम सबके लिए बराबर होते हैं,” लेकिन जब मामला गठबंधन की बैसाखियों पर टिकी सरकार का हो, तो इन नियमों की व्याख्या बदल जाती है। हिमाचल को केंद्र से मिली 545 करोड़ की ‘सशर्त’ संजीवनी ने एक नई बहस छेड़ दी है। क्या केंद्र के वित्तीय अनुशासन का डंडा केवल उन्हीं राज्यों पर चलता है जहां विपक्ष की सरकारें हैं?गठबंधन का गणित और नियमों की लचीली डोरबिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य आज केंद्र की सत्ता के ‘किंगमेकर’ हैं। इन राज्यों के लिए भी कागजों पर वही 10 दिन की डेडलाइन और ब्याज की वसूली वाले नियम लागू हैं। लेकिन सचिवालय के गलियारों में चर्चा आम है कि इन ‘सहयोगी’ राज्यों की फाइलों के लिए दिल्ली में ‘ग्रीन चैनल’ खुला रहता है। वहां तकनीकी खामियों को नजरअंदाज किया जाता है, जबकि हिमाचल जैसे राज्यों के लिए नियमों की एक-एक ‘फुल स्टॉप’ और ‘कोमा’ की भी जांच होती है।हिमाचल: आपदा और शर्तों का दोहरा बोझहिमाचल प्रदेश अभी आपदा के जख्मों से पूरी तरह उबरा भी नहीं है कि उस पर ‘परफॉरमेंस बेस्ड ग्रांट’ की शर्तें थोप दी गई हैं। एक तरफ राज्य अपनी सीमित आय और कर्ज की सीमा से जूझ रहा है, दूसरी तरफ केंद्र का यह अल्टीमेटम कि “जरा सी चूक हुई तो भविष्य का टैक्स शेयर काट लिया जाएगा।” यह स्थिति एक अभिभावक द्वारा अपने उस बच्चे को कड़ी सजा देने जैसी है जो पहले से ही बीमार है।विशेष पैकेज बनाम सामान्य सहायताजहाँ बिहार और आंध्र के लिए हजारों करोड़ के ‘विशेष पैकेज’ का रास्ता निकाला गया, वहीं हिमाचल को मिलने वाली 545 करोड़ की राशि को नियमों की बेड़ियों में जकड़ दिया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र इन शर्तों के जरिए राज्य सरकार की ‘वित्तीय स्वायत्तता’ को नियंत्रित करना चाहता है। यदि राज्य समय पर पैसा खर्च नहीं कर पाता, तो केंद्र को राजनीतिक रूप से यह कहने का मौका मिल जाएगा कि “हमने तो पैसा दिया था, लेकिन सरकार ही अक्षम थी।”आगे की राह: क्या केवल राजनीति ही पैमाना है?संघीय ढांचे (Federal Structure) की खूबसूरती इस बात में है कि केंद्र और राज्य मिलकर विकास करें। लेकिन जब वित्तीय मदद ‘चेक और बैलेंस’ के बजाय ‘दबाव और दंड’ का हथियार बन जाए, तो विकास की रफ्तार थमने का डर रहता है। 31 मार्च की डेडलाइन केवल सुक्खू सरकार की परीक्षा नहीं है, बल्कि यह केंद्र की ‘निष्पक्षता’ की भी परीक्षा होगी।प्रशासनिक हलकों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या केंद्र का यह ‘वित्तीय डंडा’ केवल अनुशासन लाने के लिए है, या फिर यह 2027 के चुनावी बिसात की तैयारी? दिल्ली से आने वाली हर पाई अब हिमाचल के लिए राहत कम और चुनौती ज्यादा नजर आ रही है।पत्रकारिता के उच्च मानकों और निष्पक्ष विश्लेषण के लिए ‘पंजाब दस्तक’ को फॉलो करें और सब्सक्राइब करें।
