हमीरपुर के ‘जननायक’ आईएएस अमरजीत सिंह की ऐतिहासिक विदाई, न गलत किया न होने दिया; क्या किसान, क्या दुकानदार और क्या कर्मचारी… हर वर्ग की आँखों में दिखी जुदाई की कसक

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​सुरेंद्र राणा,​हमीरपुर: प्रशासन में तबादले और पदोन्नति एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन जब कोई अधिकारी अपनी कार्यशैली से जनता के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ जाए, तो उसकी विदाई एक उत्सव के साथ-साथ भावुक पल बन जाती है। जिला हमीरपुर से पदोन्नत होकर शिमला सचिवालय में सचिव (Secretary) के गौरवमयी पद पर गए आईएएस अमरजीत सिंह का कार्यकाल सेवा और सत्यनिष्ठा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने एक ऐसी मिसाल कायम की जहाँ “न गलत काम के लिए कोई जगह थी और न ही किसी गलत को होने की रत्ती भर अनुमति।”
​व्यक्तित्व के मोती: सादगी ऐसी कि हर दिल जीत लिया।

अमरजीत सिंह की सबसे बड़ी अच्छाई उनकी अथाह सादगी रही। इतने बड़े पद पर होने के बावजूद उनमें रत्ती भर भी अहंकार नहीं था। वे एक ऐसे अधिकारी रहे जिन्होंने ‘साहब’ और ‘आम आदमी’ के बीच की खाई को पाट दिया। उनकी विनम्रता का आलम यह था कि दफ्तर आने वाला सबसे साधारण व्यक्ति भी खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता था। उन्होंने यह साबित किया कि पद की असली ताकत रौब दिखाने में नहीं, बल्कि लोगों के आंसू पोंछने में होती है।
​अधिकारी और कर्मचारी: सबके मार्गदर्शक और ‘अभिभावक’ बने साहब
​अमरजीत सिंह ने प्रशासन को केवल फाइलों का ढेर नहीं, बल्कि एक जीवंत ‘परिवार’ की तरह चलाया। उनके विदाई समारोह के दौरान कलेक्ट्रेट के गलियारों में जो दृश्य दिखा, वह विरला था। न केवल सर्व कर्मचारी, बल्कि उनके मातहत काम करने वाले तमाम प्रशासनिक अधिकारी भी इस विदाई पर काफी भावुक नजर आए। कर्मचारियों के लिए वे एक कड़क अफसर से ज्यादा एक सहृदय अभिभावक थे, जिन्होंने हमेशा उनके जायज हितों की रक्षा की और उनके मनोबल को कभी गिरने नहीं दिया। कलेक्ट्रेट के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर राजपत्रित अधिकारियों तक, हर कोई उनकी बेदाग कार्यकुशलता और ईमानदारी का कायल दिखा।
​आम जनमानस और दुकानदारों के बीच गहरा भावनात्मक जुड़ाव
​अमरजीत सिंह की कार्यशैली का सबसे सशक्त पहलू उनका ‘फील्ड कनेक्ट’ और सीधा जन-संवाद था। वे उन अधिकारियों में से नहीं थे जो केवल एसी कमरों में बैठकर नीति बनाते हैं। जिला हमीरपुर के किसान और बागवान आज भी उनकी उस सादगी को याद कर भावुक हो जाते हैं, जब ‘साहब’ बिना किसी लाव-लश्कर के, एक साधारण ग्रामीण की तरह उनके खेतों की मेढ़ पर खड़े होकर जमीनी समस्याएं सुनते थे। वहीं, शहर के दुकानदार वर्ग के लिए भी वे एक ऐसे रक्षक थे जिन्होंने व्यापारिक समस्याओं को हमेशा संवेदनशीलता और व्यवहारिकता से समझा। उनके जाने के बाद आज हमीरपुर के बाज़ारों और ग्रामीण अंचलों में एक गहरा खालीपन महसूस किया जा रहा है।
​तुरंत निपटारा: ‘ऑन द स्पॉट’ Action और मानवीय चेहरा
​अमरजीत सिंह की एक और बड़ी खूबी जो जनता के बीच चर्चा का विषय रही, वह थी उनका ‘खड़े-खड़े’ फैसला लेना। जब भी कोई गरीब या असहाय व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर उनके पास आता, तो वे उन्हें महीनों तक दफ्तरों के चक्कर नहीं कटवाते थे। वे तुरंत संबंधित अधिकारियों को मौके पर फोन कर स्पष्ट निर्देश देते थे कि “काम सही और तुरंत होना चाहिए”। इसी ईमानदारी, सादगी और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने उन्हें हमीरपुर की पंचायतों, वार्ड पंचों और सरपंचों के बीच एक ‘जननायक’ के रूप में स्थापित कर दिया।
​भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता और पारदर्शी शासन
​उनके कार्यकाल का एक स्वर्णिम अध्याय यह भी रहा कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सरकार की हर जनकल्याणकारी योजना का लाभ बिना किसी बिचौलिए के सीधे पात्र व्यक्ति तक पहुँचे। उन्होंने विकास कार्यों में गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया, जिससे सरकारी धन का सही सदुपयोग हुआ और विकास को नई गति मिली।
​हिमाचल के लिए सादगी और सत्यनिष्ठा के ‘रोल मॉडल’
​सादगी की प्रतिमूर्ति आईएएस अमरजीत सिंह ने यह साबित कर दिखाया कि उच्च पद की असली गरिमा तड़क-भड़क में नहीं, बल्कि ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं में बसती है। यद्यपि अब वे सचिव के रूप में राजधानी शिमला में प्रदेश स्तरीय बड़ी नीतियों का खाका तैयार करेंगे, लेकिन हमीरपुर के जन-जन के मन में उनकी कार्यशैली एक आदर्श प्रेरणा के रूप में हमेशा जीवित रहेगी। उनकी विदाई केवल एक अधिकारी का स्थानांतरण नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट प्रशासनिक युग का प्रस्थान है।

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