चंडीगढ़ न्यूज़ रूम से ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की स्पेशल रिपोर्ट (पंजाब दस्तक):
देशभर के लाखों सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों और उनके परिवारों के हक में देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक युगांतरकारी और नज़ीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर सेवाकाल के दौरान दादा या दादी का निधन हो जाता है और परिवार में कोई अन्य कमाने वाला नहीं बचता, तो आश्रित पोता भी अनुकंपा के आधार पर पक्की सरकारी नौकरी पाने का पूरा कानूनी हकदार है।
अदालत ने दो टूक शब्दों में साफ किया कि यदि पोता पूरी तरह अपने दादा-दादी पर आश्रित रहा हो और वही परिवार का एकमात्र सहारा बचा हो, तो उसे सिर्फ कागजी नियमों और तकनीकी पेंच की आड़ में नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर अपनी अंतिम मुहर लगाते हुए केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय की विशेष याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।
मामले का कानूनी विवरण:
मुकदमे का नाम: भारत संघ बनाम जितेंद्र वर्मा
सुप्रीम कोर्ट की पीठ: माननीय न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा एवं माननीय न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई
क्या था पूरा मामला?
यह संवेदनशील मामला पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल से जुड़ा है। भोपाल में रेलवे कर्मचारी छमा बाई के पति और इकलौते बेटे की वर्षों पहले असामयिक मृत्यु हो गई थी। माता-पिता के असमय चले जाने के बाद अनाथ हुए मासूम पोते जितेंद्र वर्मा का पूरा पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई और देखभाल उनकी दादी छमा बाई ने ही की थी।
दादी ने अपने सेवाकाल के दौरान ही रेलवे के आधिकारिक सर्विस रिकॉर्ड में अपने पोते का नाम कानूनी वारिस और नॉमिनी के रूप में दर्ज करवा दिया था। इसके साथ ही सक्षम अदालत से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी हासिल कर लिया गया था। साल 2016 में ड्यूटी के दौरान ही दादी छमा बाई का भी देहांत हो गया। इसके बाद पूरे परिवार में केवल पोता जितेंद्र ही बेसहारा बचा, जिसके सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो गया।
रेलवे की आपत्तियां और अदालत का कड़ा रुख:
दादी के निधन के बाद जब जितेंद्र ने अनुकंपा नियुक्ति की गुहार लगाई, तो रेलवे प्रशासन ने तकनीकी पेंच फंसाते हुए आवेदन खारिज कर दिया। रेलवे का तर्क था कि नियमावली में सीधे तौर पर पोते को अनुकंपा नौकरी देने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और वह कानूनी तौर पर गोद लिया हुआ पुत्र सिद्ध नहीं होता।
इसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने रेलवे की दलीलों को सिरे से नकारते हुए साफ कहा कि अनुकंपा नीति के तहत विशेष परिस्थितियों में निकट संबंधी और वास्तविक आश्रित को नौकरी पाने का पूरा अधिकार है। अदालत ने माना कि जब कर्मचारी ने जीते-जी पोते को अपना आश्रित माना और परिवार में कोई दूसरा वारिस नहीं है, तो उसे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने रेलवे पर हर्जाना लगाते हुए तुरंत नियुक्ति के सख्त आदेश जारी किए थे।
सुप्रीम कोर्ट की दो टूक:
रेलवे जब इस आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने भी रेलवे की अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने टिप्पणी की कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल मकसद किसी कर्मचारी के गुजर जाने के बाद उजड़े हुए परिवार को अचानक आए आर्थिक संकट से तत्काल राहत देना है। ऐसे में संवेदनशील और मानवीय मामलों को संकीर्ण नियमों में नहीं उलझाया जा सकता।
उत्तर भारत के लाखों परिवारों को मिलेगी नई कानूनी ढाल:
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश के उन तमाम परिवारों के लिए बहुत बड़ी कानूनी ढाल बनकर आया है, जहां विषम परिस्थितियों में दादा-दादी अपने अनाथ पोते-पोतियों का पालन कर रहे हैं। अब कोई भी सरकारी महकमा नियमों की मनमानी व्याख्या करके ऐसे आश्रित युवाओं का हक नहीं छीन पाएगा।
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