वरिष्ठ पत्रकार भेषज की विशेष रिपोर्ट (धर्मशाला/कांगड़ा):
राजनीति का नियम है—जब तक आप सामने हैं, तब तक चर्चा है। लेकिन जब आप किसी ख़ास मौके से नदारद हो जाएं, तो चर्चा नहीं, सीधे ‘धमाका’ होता है! रविवार को धर्मशाला में जब भाजपा के तेजतर्रार नेता व विधायक सुधीर शर्मा के जन्मदिन पर उनके आवास पर समर्थकों का तांता लगा था, ढोल-नगाड़े बज रहे थे और सोशल मीडिया पर बधाइयों का सैलाब आया हुआ था, तब एक ऐसी खामोशी गूंजी जिसने कांगड़ा से लेकर शिमला तक के सियासी पारे को अचानक बढ़ा दिया। यह खामोशी थी कांगड़ा के पड़ोसी भाजपा विधायक पवन काजल की!
न तो काजल साहब सुधीर शर्मा के घर केक कटवाने पहुंचे, न ही उनके आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से एक लाइन का भी औपचारिक संदेश जारी हुआ। अब कांगड़ा की चौपालों से लेकर डिजिटल मीडिया तक एक ही सवाल तैर रहा है—क्या यह महज़ एक निजी व्यस्तता है, या फिर कांगड़ा भाजपा का अंदरूनी ‘कोल्ड वार’ अब अपने सबसे तीखे मोड़ पर पहुंच चुका है?
2019 का वो एहसान और 2026 की यह दूरी!
सियासी पन्नों को थोड़ा पीछे पलटें, तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है। राजनीतिक गलियारों में आज भी साल 2019 के लोकसभा चुनावों का वो घटनाक्रम याद किया जाता है, जब सुधीर शर्मा ने खुद दावेदारी पीछे खींचकर पवन काजल की राह आसान की थी और टिकट दिलाने में पर्दे के पीछे से मुख्य भूमिका निभाई थी। एक दौर था जब दोनों नेताओं की जुगलबंदी के चर्चे पूरे प्रदेश में होते थे।
लेकिन राजनीति में ‘दोस्ती’ स्थायी नहीं होती, सिर्फ ‘हित’ स्थायी होते हैं। वक्त बदला, दल बदले और समीकरण ऐसे बिगड़े कि आज एक ही पार्टी के झंडे तले रहने के बावजूद दोनों के रास्ते अलग नज़र आ रहे हैं। इससे पहले भी कई बार पवन काजल के सोशल मीडिया पोस्ट्स से सुधीर शर्मा की तस्वीरों का गायब रहना और सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे से दूरी बनाए रखना विवाद की वजह बन चुका है।
सरकार का ‘रडार’ या ‘साइलेंट मोड’ का गेम?
कांगड़ा की राजनीति के जानकार इस चुप्पी के पीछे कई और परतें भी देख रहे हैं। चर्चाएं यह भी हैं कि क्या पवन काजल का यह ‘साइलेंट मोड’ महज़ सुधीर शर्मा से दूरी है, या फिर प्रदेश की मौजूदा सियासी परिस्थितियों और सरकार की पैनी नज़र से खुद को सुरक्षित रखने का कोई ‘मास्टरस्ट्रोक’?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता पक्ष और खुफिया तंत्र हमेशा ऐसे बड़े दिग्गजों के हर कदम पर अपनी नजर जमाए रखता है। ऐसे में पवन काजल की यह खामोशी कहीं किसी नए सियासी मोड़ का इशारा तो नहीं?
फिलहाल, न तो पवन काजल के खेमे से कोई सफाई आई है और न ही सुधीर शर्मा ने इस पर कोई टिप्पणी की है। लेकिन एक बात साफ है—दोनों दिग्गजों के बीच जमी यह ‘बर्फ’ अगर जल्द पिघली नहीं, तो आने वाले दिनों में कांगड़ा भाजपा के अंदरूनी समीकरणों में एक बड़ा भूचाल तय है!
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