पालमपुर से वरिष्ठ पत्रकार भेषज की विशेष रिपोर्ट
पालमपुर। हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजनीति के शिखर पुरुष शांता कुमार ने अपने 93वें जन्मदिन के अवसर पर अपने संपूर्ण राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवन का लेखा-जोखा साझा किया। जीवन के इस पड़ाव पर उन्होंने अपने सफर को लेकर गहरा संतोष जताया और खुद को दुनिया का सबसे खुशकिस्मत व्यक्ति करार दिया। उन्होंने भावुक होकर कहा, “यदि ईश्वर ने दुनिया के सबसे सुखी इंसानों की कोई सूची बनाई होगी, तो उसमें मेरा नाम सबसे ऊपर होगा।”
शांता कुमार ने स्पष्ट किया कि उन्हें अपने जीवन से कोई गिला-शिकवा नहीं है। वे जीवन की अंतिम सांस तक विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट के जरिए निस्वार्थ भाव से समाज सेवा के संकल्प पर अडिग रहेंगे।
सिद्धांतों की खातिर गंवाई कुर्सी, पर नहीं डिगे कदम
अपने मुख्यमंत्रित्व काल और सियासी उतार-चढ़ाव को याद करते हुए पूर्व सीएम ने दो टूक कहा कि उन्होंने हमेशा सिद्धांतों और मूल्यों की राजनीति की है। उन्होंने कहा, “मुझे भले ही बीच में सत्ता छोड़नी पड़ी, लेकिन इस बात का रत्ती भर भी मलाल नहीं है। मैंने सत्ता जरूर छोड़ी, लेकिन सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ा।” हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनके सत्ता से हटने का दुख उस समय हिमाचल की जनता को जरूर हुआ था, मगर वे मूल्यों से समझौता नहीं कर सकते थे।
जेल की सलाखों के पीछे जन्मा ‘अंत्योदय’ का संकल्प
आपातकाल के दौर को याद करते हुए शांता कुमार ने बताया कि जब वे 19 महीने तक जेल में बंद थे, तब उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साहित्य का गहराई से अध्ययन किया। स्वामी जी के इस विचार ने कि ‘भगवान केवल मंदिरों में नहीं बसते, बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा ही सच्ची ईश्वर वंदना है’, उनके जीवन को एक नई दिशा दी। इसी वैचारिक मंथन से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान (अंत्योदय) की भावना का जन्म हुआ।
देश के 11% गरीबों के लिए बने ठोस योजना
वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की मुक्तकंठ से सराहना की और कहा कि आज देश हर मोर्चे पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही उन्होंने आग्रह किया कि देश की जो 11 प्रतिशत आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे संघर्ष कर रही है, उनके कल्याण और उत्थान के लिए विशेष अंत्योदय योजना को धरातल पर और अधिक गति से लागू किया जाना चाहिए।
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