हिमाचल प्रदेश राजनीति में विवाद और जनता के मुद्दे

लाल बत्ती की भूख, वर्चुअल दंगल और बदहाल अवाम: हुकूमत की नूराकुश्ती में पिसता देवभूमि का मतदाता!

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​धर्मशाला (पंजाब दस्तक ब्यूरो, भेषज):
पहाड़ी रियासत के हुक्मरानों की चौसर पर इस घड़ी केवल एक प्यादे की तैनाती को लेकर घमासान मचा है। हुकूमत के वजूद में आने के बाद से ही इस खाली ओहदे पर ताजपोशी की अफवाहें सुलगती रही हैं, मगर हालिया दौर में यह पूरा तमाशा जनहित की बहसों को दरकिनार कर इंटरनेट के अखाड़े में तब्दील हो चुका है। कुछ स्वयंभू सियासतदान कयासों की रोटियां सेंक रहे हैं, तो वहीं सूबे के दो नामचीन चेहरे—एक सत्ताधारी खेमे से और दूसरा भगवा दल से ताल्लुक रखने वाला—सोशल प्लैटफॉर्म पर निजी लांछनों के खंजर चला रहे हैं।


​पहाड़ की जागरूक जनता बखूबी पहचानती है कि इन परदों के पीछे कौन से किरदार हैं। कुछ लोग इस ड्रामे से अपना मनोरंजन कर रहे हैं, मगर संजीदा नागरिकों के जेहन में यह चुभता हुआ सवाल है कि क्या जनता के पसीने की कमाई पर पलने वाले रहनुमाओं के पास बुनियादी समस्याओं से मुंह मोड़कर केवल कीचड़ उछालने का ही शगल बचा है?


​आकाओं की चौखट पर सजदा और सुरक्षा का नया आडंबर
खबरों के मुताबिक इस रुतबे को हथियाने के लिए राजधानी दिल्ली के गलियारों में माथा टेकने की होड़ मची है। मगर ज़मीनी हकीकत यह है कि किसी चहेते के गले में पद की माला डलने से क्या सूबे की गर्दन पर लदा भारी-भरकम कर्ज उतर जाएगा? क्या इससे खजाने का घाटा या राजस्व की खाई पट जाएगी?
​सच यह है कि माली तंगी में एक धेले का भी फर्क नहीं पड़ेगा; अलबत्ता खाकी वर्दी का एक नया दस्ता जनता के जान-माल की हिफाजत छोड़कर वीआईपी की चमचमाती गाड़ियों को रास्ता दिखाने में झोंक दिया जाएगा।


​सवालों से खौफ और औपचारिकता का छलावा
आश्चर्य की बात यह है कि इस फिजूलखर्ची पर सत्ता से आंख में आंख डालकर पूछने की जुर्रत नहीं होती। जब हुक्मरान मीडिया के रूबरू होते हैं, तो तहजीब से स्वागत की रस्म निभाते हैं, मगर कड़वे और जायज सवालों से कन्नी काट जाते हैं। लोकतंत्र में प्रेस वार्ता का मकसद जवाबदेही होता है, लेकिन व्यवस्था ऐसी बना दी गई है कि जो नुमाइंदा चुभता हुआ सवाल दागे, हुक्मरान उसे अपनी नजरों में खटकता मानकर अगली बैठकों से बेदखल करने की ताक में रहते हैं। यही वजह है कि अब प्रेस कॉन्फ्रेंस की जगह चंद लम्हों के रटे-रटाए वक्तव्य देकर पिंड छुड़ाने की परिपाटी चल पड़ी है।


​आगामी इम्तिहान, संवैधानिक कद और दलबदलुओं का दोगलापन
मंत्रिमंडल के इस विस्तार से आम जनजीवन पर कोई तिलिस्म नहीं टूटेगा, विशेषकर तब जब अगले बरस ही जनता की अदालत में नई सरकार चुनने की बारी है। नागरिकों को यह तय करना होगा कि वे स्क्रीन पर क्या देखना चाहते हैं—नेताओं की बेतुकी तू-तू, मैं-मैं या अपने बच्चों का मुस्तकबिल, तालीम और रोजगार? आए दिन नुमाइंदे कैमरे के आगे आकर हुकूमतों की खामियों का रोना रोते हैं, जिससे तंग आकर आवाम अब इन भटकाने वाली बहसों से मुंह मोड़ने लगी है।


​लोकतांत्रिक आईने में देखें तो आवाम के वोटों से चुने गए विधायक का दर्जा शासन तंत्र के सर्वोच्च नौकरशाहों—चाहे वे मुख्य सचिव हों या डीजीपी—से भी कहीं ऊपर मुकर्रर किया गया है। यह रुतबा संविधान ने जनता के जनादेश को बख्शा है, मगर कुछ माननीयों ने इस गरिमा को अपनी निजी जागीर समझ लिया है। हद तो यह है कि हाल ही में तिरंगे का दामन छोड़कर भगवा चोला ओढ़ने वाले कई चेहरे कल तक डबल इंजन के दावों पर जहर उगलते थे, और आज पाला बदलते ही सुर बदलकर खुद को पाक-साफ साबित करने में जुटे हैं।


​असली त्रासदी: जब दम तोड़ती है सांस और खाली रह जाता है हाथ
कुर्सी की इस छीना-झपटी से दूर, आम हिमाचली को उस रोज अपनी बेबसी पर रोना आता है जब उसका कोई अपना अस्पताल के वार्ड में अंतिम सांसें गिन रहा होता है और खिड़की पर लगा स्वास्थ्य कार्ड कागजी साबित हो जाता है। इंसान का दिल तब दहल जाता है जब जेब में फूटी कौड़ी न होने के चलते इलाज के अभाव में कोई अपना दम तोड़ दे।


​अब चुप्पी तोड़ने की घड़ी है। आगामी चुनावों में अपने मत को केवल औपचारिकता न समझें; अपनी तकदीर उसी के हाथों में सौंपें जिसकी नीयत में जनता का दर्द और सूबे का स्वाभिमान झलकता हो। मुख्यमंत्री महोदय से भी यही गुजारिश है कि जिस किसी को भी ओहदे की रेवड़ी बांटनी है, फौरन बांटें; पर सूबे की असली फिक्र करते हुए बेकाबू हो रहे वित्तीय घाटे को साधें, ताकि हिमाचल खुशहाली की राह पर आगे बढ़ सके।


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​’जनता की बात, सच की आवाज’
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