कुल्लू छेड़छाड़ मामले में BlaBlaCar निजी कार

कुल्लू छेड़छाड़ मामला: टैक्सी चालक नहीं, ‘ब्लाब्ला’ निजी कार में हुई शर्मनाक हरकत; बिना तथ्यों के देवभूमि और टैक्सी यूनियनों को बदनाम करना बंद करे मीडिया

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ / पंजाब दस्तक, न्यूज़ रूम शिमला
​कुल्लू जिला के भुंतर से दियार जा रही 25 वर्षीय युवती के साथ सुनसान रास्ते पर ले जाकर छेड़छाड़ और मारपीट करने के मामले में कई मीडिया संस्थानों और अखबारों ने बिना सोचे-समझे गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग की है। कई समाचार पत्रों और पोर्टलों ने बिना किसी ठोस पड़ताल के इस घिनौनी वारदात का ठीकरा सीधा ‘टैक्सी चालक’ के सिर फोड़ दिया है। यह न केवल पूरी तरह असत्य और भ्रामक है, बल्कि देवभूमि हिमाचल और यहां की मेहनतकश टैक्सी बिरादरी की छवि को पूरे देश में धूमिल करने का गैर-जिम्मेदाराना प्रयास है। पंजाब दस्तक की ग्राउंड पड़ताल में यह पूरी तरह सिद्ध हो चुका है कि यह गाड़ी कोई कॉमर्शियल पंजीकृत टैक्सी नहीं, बल्कि ‘ब्लाब्ला’ (BlaBlaCar) ऐप के जरिए शेयरिंग पर चलने वाली एक निजी (प्राइवेट) कार थी।


​मामले के अनुसार, दियार निवासी पीड़िता इशिता शर्मा ने भुंतर से घर जाने के लिए 500 रुपये देकर यह निजी कार ली थी, जो किसी सवारी को छोड़कर खाली लौट रही थी। आरोपी चालक रूम सिंह (निवासी जम्मोट) उसे निर्धारित रास्ते से ले जाने के बजाय अपर जम्मोट के पास सुनसान जंगल की ओर ले गया। वहां उसने युवती के साथ अश्लील हरकतें कीं और विरोध करने पर मारपीट की। पीड़िता ने तत्काल 112 हेल्पलाइन पर पुलिस को सूचना दी, जिस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है।


​सख्त नियमों से संचालित होती हैं हिमाचल की टैक्सी यूनियनें
​देवभूमि हिमाचल में हर जिले की टैक्सी ऑपरेटर यूनियनों के अपने बेहद कड़े और अनुशासित नियम हैं। कुल्लू-मनाली की प्रमुख टैक्सी ऑपरेटर यूनियन के अध्यक्ष राम रतन शर्मा सहित शिमला, धर्मशाला, मंडी और अन्य जिलों की यूनियनों ने चालकों के लिए पहले से ही सख्त निर्देश जारी कर रखे हैं:
​महिला सुरक्षा व शालीन व्यवहार: यूनियनों का स्पष्ट निर्देश है कि पर्यटकों, बच्चों और विशेषकर अकेले सफर करने वाली महिलाओं व बेटियों के साथ हमेशा आदर और पूरी सुरक्षा की भावना से पेश आएं।


​अतिथि सत्कार की परंपरा: देवभूमि के टैक्सी चालक पर्यटकों का मान-सम्मान और आवभगत अपनी परंपरा मानकर करते हैं। ट्रैफिक जाम या अन्य तकनीकी वजहों से कभी-कभार हल्की कहासुनी या बहस होना अलग बात है, लेकिन ऐसी आपराधिक व दरिंदगी भरी मानसिकता से स्थानीय टैक्सी चालक कोसों दूर रहते हैं।


​सख्त निगरानी व जीपीएस: व्यावसायिक टैक्सियों में जीपीएस लगे होते हैं और हर चालक का पूरा रिकॉर्ड यूनियन व प्रशासन के पास पंजीकृत रहता है। 100 में से कोई इक्का-दुक्का अपवाद हो सकता है, लेकिन किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार सामने आने पर यूनियन स्वयं उसके खिलाफ सबसे पहले सख्त कार्रवाई करती है।


​निजी ऐप का अनियंत्रित खेल और गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता
​इसके उलट ‘ब्लाब्ला’ जैसी राइड-शेयरिंग सेवाओं में गैर-व्यावसायिक निजी वाहन बेरोकटोक दौड़ते हैं। इन गाड़ियों पर न तो किसी यूनियन का अनुशासन होता है और न ही प्रशासन की कोई सीधी मॉनिटरिंग। जब ऐसी निजी गाड़ियों में कोई वारदात घटती है, तो दिल्ली से लेकर पूरे देश में अखबारों में सिर्फ ‘टैक्सी’ लिखकर सुर्खियां बना दी जाती हैं। इससे बाहरी राज्यों में पूरे हिमाचल प्रदेश और यहां के ईमानदार टैक्सी चालकों की साख पर गहरी चोट पहुंचती है।


​पत्रकारों और मीडिया बंधुओं को कोई भी संवेदनशील खबर लिखते समय पूरी सत्यता जांचनी चाहिए। जो घटना घटी है उसे जरूर लिखें, लेकिन यह भी स्पष्ट करें कि गाड़ी कौन सी थी। जब यह साफ हो चुका है कि गाड़ी निजी थी, तो पूरी टैक्सी बिरादरी और देवभूमि को बेवजह बदनाम करना पत्रकारिता के उसूलों के खिलाफ है।


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