सुरेंद्र राणा | ब्यूरो चीफ | पंजाब दस्तक
चंडीगढ़ न्यूज़ रूम से सीधी रिपोर्ट:
पंजाब में चुनावी शंखनाद में महज़ तीन महीने का वक़्त बचा है। सियासी पारा सातवें आसमान पर है और हर दल एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए पैंतरेबाज़ी कर रहा है। लेकिन इस चुनावी रणभेरी के बीच पंजाब दस्तक के न्यूज़ रूम से एक ऐसा चौंकाने वाला सियासी खुलासा सामने आया है, जिसने राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है।
जिस मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और भारतीय चुनाव आयोग की साख पर दिल्ली के मंचों से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस रोज़ नए सवाल दागते हैं, सोशल मीडिया पर अफ़वाहों की झड़ी लगाते हैं—उसी ज्ञानेश कुमार की निगरानी में तैयार हुई पंजाब की फ़ाइनल वोटर लिस्ट पर न तो सत्ताधारी ‘आप’ को कोई ख़ामी नज़र आई और न ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को!
अफ़वाहों पर पूर्णविराम: ज्ञानेश कुमार ही हैं सीईसी
सबसे पहले अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करने वालों को यह साफ़ समझ लेना चाहिए कि ज्ञानेश कुमार अपने पद पर पूरी मज़बूती से डटे हुए हैं। उनके नेतृत्व में ही पूरे देश सहित पंजाब में स्पेशल समरी रिवीज़न (एसआईआर) की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया है। किसी भी तरह के बदलाव की अटकलें महज़ राजनीतिक पैंतरेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं साबित हुईं।
बड़ा सवाल: तीन महीने बाद दंगल, फिर यह ‘रहस्यमयी’ ख़ामोशी क्यों?
पंजाब दस्तक सीधे सवाल दागता है—यह कैसे मुमकिन हुआ?
जब दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनाव आयोग की नीयत पर उंगलियाँ उठाई जाती हैं, तो चंडीगढ़ पहुँचते ही आवाज़ कुंद क्यों हो जाती है?
पंजाब में महज़ 90 दिन बाद सत्ता का सबसे बड़ा इम्तिहान होना है। ऐसे में वोटर लिस्ट के स्पेशल रिवीज़न (एसआईआर) के दौरान दोनों दलों के बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) चुपचाप दस्तख़त करके क्यों निकल गए?
क्या दोनों पार्टियों के पास फ़ाइनल वोटर लिस्ट में एक भी फ़र्ज़ी वोट या गड़बड़ी ढूंढने का दम नहीं था, या फिर ज़मीनी सच्चाई यह है कि आयोग का डेटा पूरी तरह पुख़्ता निकला?
दोहरा चरित्र बेनक़ाब
पंजाब के आम आदमी पार्टी सरकार के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है, तो वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही है। दोनों ही दल जनता के बीच जाकर यह साबित करने में जुटे हैं कि सिस्टम उनके ख़िलाफ़ काम कर रहा है। लेकिन चुनाव आयोग के आधिकारिक दस्तावेज़ चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि जब दावे और आपत्तियाँ दर्ज कराने का वैधानिक वक़्त था, तब दोनों में से किसी भी दल ने आयोग की दहलीज पर कोई ठोस विरोध दर्ज नहीं कराया।
पंजाब दस्तक का दो-टूक विश्लेषण
यह राजनीति का वो दोहरा चेहरा है जिसे जनता को देखना और समझना होगा। बाहर जनता की अदालत में चुनाव आयोग को ‘विलेन’ बताना और भीतर संवैधानिक चौखट पर उसी आयोग की फ़ाइनल वोटर लिस्ट पर बिना चूँ-चपड़ किए मुहर लगा देना—यह बताता है कि विरोध सिर्फ़ टीवी बहसों और चुनावी भाषणों की चमक-दमक तक सीमित है।
जब तीन महीने बाद पंजाब का वोटर पोलिंग बूथ पर बटन दबाएगा, तो वह इसी फ़ाइनल वोटर लिस्ट के आधार पर फ़ैसला करेगा जिसे दोनों बड़े दल अपनी मौन स्वीकृति दे चुके हैं।
देखते रहिए पंजाब दस्तक—सच, बेबाक और बिना लाग-लपेट के!
