पंजाब दस्तक विशेष रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा
मंडी/शिमला। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ, प्रभावशाली नेताओं में शुमार और पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर ने सक्रिय राजनीति को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। पांच दशक तक हिमाचल की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाने वाले और आठ बार के पूर्व विधायक कौल सिंह ठाकुर के इस अचानक सन्यास के ऐलान से सूबे की सियासत में भूचाल आ गया है।
अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, कौल सिंह ठाकुर वर्तमान सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार में अपनी वरिष्ठता के मुताबिक कोई बड़ा ओहदा या सम्मान न मिलने से लंबे समय से अंदरखाने काफी नाराज चल रहे थे।
संगठन और संघर्ष से भरा रहा राजनीतिक सफर
कौल सिंह ठाकुर का सियासी सफर बेहद शानदार, ऐतिहासिक और संघर्षों से भरा रहा है। वह मंडी जिले की द्रंग विधानसभा सीट से रिकॉर्ड आठ बार विधायक चुने गए। वह विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के गरिमामयी पद पर रहे और दो बार हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (HPCC) के अध्यक्ष के रूप में संगठन की कमान संभाली। इसके अलावा वह प्रदेश सरकार में चार बार कैबिनेट मंत्री बनकर राजस्व, स्वास्थ्य, कानून और आईपीएच (जल शक्ति विभाग) जैसे भारी-भरकम विभागों का जिम्मा संभाल चुके हैं। साल 2003 के दौर में भी वे सरकार और संगठन के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक थे।
उपेक्षा की टीस, ढलती उम्र और बदलाव की बयार
75 साल की उम्र पार कर चुके कौल सिंह ठाकुर पिछले दो विधानसभा चुनावों में अपनी पारंपरिक सीट से लगातार हार का सामना कर रहे थे। ढलती उम्र, लगातार दो चुनावी शिकस्त और मौजूदा सुक्खू सरकार में लगातार हो रही उपेक्षा की टीस के बीच अब उन्होंने राजनीति में बदलाव की बयार को स्वीकार कर लिया है। उनका मानना है कि अब समय आ गया है जब युवाओं को नेतृत्व का आगे बढ़कर अवसर मिलना चाहिए।
संत रामपाल की शरण में पहुंचे कौल सिंह, मिला अध्यात्म का मार्ग
राजनीति से किनारा करने के साथ ही कौल सिंह ठाकुर का झुकाव अब पूरी तरह से सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन की ओर हो गया है। हाल ही में वह अपनी पत्नी के साथ प्रसिद्ध संत रामपाल जी महाराज के दर पर पहुंचे और राजनीति से सन्यास की बात कही। इस पर संत रामपाल ने उन्हें अध्यात्म की राह दिखाते हुए कहा कि अब संसार के प्रपंचों को छोड़कर पूरा मन प्रभु भक्ति में लगाओ। कौल सिंह ठाकुर ने संत को बताया कि वह अपनी पत्नी के साथ नियमित रूप से उनका सत्संग सुनते हैं। इस मुलाकात के दौरान उन्होंने संत रामपाल को गर्मियों के मौसम में शिमला आने का विशेष न्योता भी दिया।
हिमाचल की राजनीति में शेर जैसा रुतबा रखने वाले एक कद्दावर और अनुभवी नेता द्वारा अचानक सक्रिय राजनीति छोड़कर भक्ति और सामाजिक जीवन की राह चुनना प्रदेश की सियासत में एक बड़े युग का अंत है।
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