पंजाब दस्तक
करोट में कमरे से निकले डेढ़ साल पुराने हज़ारों दस्तावेज़; स्थानीय बनाम बाहरी नियुक्ति और सुस्त अफ़सरशाही पर उठे गंभीर सवाल
आज के आधुनिक डिजिटल युग में जहाँ व्हाट्सएप, ईमेल और ऑनलाइन बैंकिंग के ज़रिए सेकंडों में जानकारी एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाती है, वहाँ आम आदमी तक समय पर सरकारी और निजी दस्तावेज़ पहुँचाने का ज़िम्मा डाक विभाग का है। लेकिन जब महीने भर में पहुँचने वाला आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक का एटीएम कार्ड डेढ़-डेढ़ साल तक किसी कर्मचारी के बंद कमरे में धूल फाँकता रहे, तो गुस्सा फूटना तय है।
(विशेष रिपोर्ट: उमांशी राणा, वरिष्ठ पत्रकार, हमीरपुर)
अक्सर जब कोई काम बहुत धीमी गति से चल रहा होता है, तो लोग तंज़ कसते हुए कहते हैं—”क्या भाई, पोस्ट ऑफिस खोल के बैठे हो क्या?”
सुजानपुर के करोट गाँव से सामने आई इस घटना ने इस कहावत को सच साबित कर दिया है और डाक विभाग की कछुआ चाल वाली व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
20 गाँवों का सरकारी रिकॉर्ड दबाकर बैठा रहा डाकिया
मामला उप डाकघर भलेट के तहत आने वाली डाक शाखा करोट का है। आरोप है कि यहाँ तैनात ग्रामीण डाक सेवक पिछले डेढ़ साल से लगभग 20 गाँवों की डाक लोगों तक पहुँचाने की बजाय उसे अपने कमरे में ही डंप करता रहा।
जब शिकायतों के बाद डाक निरीक्षक ने औचक निरीक्षण किया और कमरे की तलाशी ली, तो वहाँ से डेढ़ साल पुराने पत्रों, आधार कार्ड, पैन कार्ड, एटीएम कार्ड और कई महत्वपूर्ण सरकारी कागज़ात का अंबार बरामद हुआ।
बाहरी नियुक्ति vs स्थानीय सरोकार: आखिर गाँव वाले क्यों भुगते?
स्थानीय ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी भारी रोष है कि पहले डाक सेवक उसी गाँव या आसपास के क्षेत्र का होता था। स्थानीय व्यक्ति होने के नाते उस पर एक सामाजिक दबाव और नैतिक ज़म्मेदारी होती थी। वह हर घर-परिवार को व्यक्तिगत रूप से पहचानता था।
लेकिन अब बाहरी राज्यों (जैसे हरियाणा या अन्य क्षेत्रों) के लोगों को बिना किसी जमीनी पड़ताल के यहाँ तैनात कर दिया जाता है, जिन्हें न तो स्थानीय रास्तों की सही जानकारी होती है और न ही जनता के प्रति कोई जवाबदेही। इसी का नतीजा है कि आरोपी कर्मचारी आराम से 20 गाँवों का भविष्य अपने कमरे में बंद करके बैठा रहा।
बड़े अधिकारियों पर तीखे सवाल: डेढ़ साल से सो रहा था हमीरपुर डाक मंडल?
यह मामला सिर्फ एक छोटे कर्मचारी की लापरवाही का नहीं है, बल्कि हमीरपुर डाक मंडल के बड़े अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर सीधा हमला है:
कागज़ों पर होल्ड, ज़मीन पर झोल: सिस्टम में महीनों से हज़ारों डाके “होल्ड” पर दिख रही थीं। क्या हमीरपुर के बड़े अधिकारियों के डैशबोर्ड पर यह लाल बत्ती नहीं जली?
कहाँ गायब थीं चेकिंग टीमें? नियम के मुताबिक हर डाक शाखा का समय-समय पर सरप्राइज इंस्पेक्शन (औचक निरीक्षण) होना अनिवार्य है। क्या डेढ़ साल में एक बार भी किसी बड़े अधिकारी ने करोट शाखा में कदम रखना मुनासिब नहीं समझा?
सिर्फ निलंबन से बात नहीं बनेगी: मंडी के चौंतड़ा के बाद अब हमीरपुर के सुजानपुर में यह दूसरी बड़ी घटना है। सवाल यह है कि क्या केवल एक छोटे कर्मचारी को सस्पेंड कर देने से उन ग्रामीणों के नुकसान की भरपाई हो जाएगी, जिनकी पेंशन, नौकरी के कॉल लेटर और बैंक खाते इस सुस्ती की वजह से अटके रहे?
पंजाब दस्तक का सीधा सवाल
डाक विभाग को अब अपनी इस “सुस्त पोस्ट ऑफिस” वाली छवि से बाहर निकलना होगा। अगर डिजिटल इंडिया के दौर में भी जनता को अपने ज़रूरी दस्तावेज़ों के लिए डेढ़-डेढ़ साल का इंतज़ार करना पड़े और अधिकारियों की नींद सिर्फ बवाल मचने के बाद खुले, तो ऐसे ढुलमुल सिस्टम पर सवाल उठना बिल्कुल लाजमी है। जनता अब सिर्फ खानापूर्ति नहीं, बल्कि बड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की माँग कर रही है।
