हिमाचल ₹250 करोड़ पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, रजनीश बंसल की अग्रिम जमानत रद्द

हिमाचल का ₹250 करोड़ का छात्रवृत्ति घोटाला: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा प्रहार; ED की दलीलों पर लगी मुहर, हिमालयन ग्रुप के चेयरमैन रजनीश बंसल की अग्रिम जमानत रद्द, अब गिरफ्तारी तय!

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​सुरेंद्र राणा — ब्यूरो चीफ, ‘पंजाब दस्तक’
विशेष एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
शिमला / धर्मशाला

​हिमाचल प्रदेश के बहुचर्चित और शर्मनाक ₹250 करोड़ रुपए के पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति घोटाले में आरोपियों की गर्दन पर कानून का शिकंजा पूरी तरह कस गया है। शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने मामले पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए सिरमौर स्थित हिमालयन ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन रजनीश बंसल की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।


​अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अपीलों और तीखी दलीलों को स्वीकार करते हुए साफ कर दिया है कि गरीबों और जरूरतमंद बच्चों के हक के पैसों की हेराफेरी में मनी ट्रेल (रुपयों की अवैध आवाजाही) की आखिरी कड़ी तक पहुँचने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) बेहद जरूरी है।


​पीठ की तीखी टिप्पणी: “आर्थिक अपराधों में निष्पक्ष जांच का मिले पूरा मौका”
​सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की दो सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान बेहद तल्ख टिप्पणी की।


​पीठ ने स्पष्ट लहजे में कहा:
​”आर्थिक अपराधों से जुड़े गंभीर मामलों में जांच एजेंसियों को निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभावी जांच करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। वित्तीय हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग के ऐसे बड़े मामलों में कस्टोडियल पूछताछ की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता।”


​अदालत में ED की धारदार दलीलें
​सुनवाई के दौरान ED ने अदालत में पक्ष रखते हुए कहा कि यह मामला अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के होनहार छात्रों के भविष्य से जुड़ा है:
​मनी ट्रेल और कस्टडी जरूरी: ED ने कोर्ट को बताया कि हिरासत में पूछताछ के बिना पैसों के अवैध प्रवाह (Money Trail) और मनी लॉन्ड्रिंग के इस पूरे मकड़जाल का पर्दाफाश करना संभव ही नहीं है।
​जांच हो रही थी प्रभावित: एजेंसी ने दलील दी कि आरोपी को अग्रिम जमानत मिलने के कारण निष्पक्ष जांच में बाधा आ रही थी और कई अहम सबूतों तक पहुँचने में रुकावट बन रही थी।


​आखिर क्या है ₹250 करोड़ का यह महा-स्कैम?
​पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना केंद्र और राज्य सरकार की एक संयुक्त योजना है, जिसके तहत गरीब और वंचित वर्ग के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है।


​2018 में खुली पोल: साल 2018 में शिक्षा विभाग की जांच के दौरान छात्रवृत्ति वितरण में बड़े पैमाने पर धांधली का खुलासा हुआ था।
​2012 से 2018 का फर्जीवाड़ा: जांच में सामने आया कि साल 2012-13 से 2017-18 के बीच राज्य के कई निजी शिक्षण संस्थानों ने फर्जी दाखिले दिखाकर, जाली दस्तावेज तैयार करके और कागजों पर ‘काल्पनिक छात्र’ खड़े करके सरकारी खजाने को करीब ₹250 करोड़ का चूना लगाया।
​22 से ज्यादा संस्थान रडार पर: इस पूरे गिरोह में प्रदेश के 22 से अधिक निजी शिक्षण संस्थानों की संदिग्ध भूमिका उजागर हुई थी।


​CBI के बाद ED की एंट्री: यूं कसा शिकंजा
​2019 का हाईकोर्ट आदेश: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए साल 2019 में इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी थी।


​CBI की एफआईआर: सीबीआई ने जांच के दौरान कई निजी शिक्षण संस्थानों के संचालकों, बिचौलियों और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के मुकदमे दर्ज किए।
​PMLA के तहत ED का केस: सीबीआई जांच में उजागर हुए वित्तीय अपराधों के आधार पर ED ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत अलग से मामला दर्ज कर मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की।
​सुप्रीम कोर्ट से झटका: इसी जांच की कड़ी में ED ने रजनीश बंसल को मिली अग्रिम जमानत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अब शीर्ष अदालत ने रद्द कर दिया है।


​अन्य संस्थान संचालकों की सांसें अटकीं
​गरीब बच्चों के हक पर डाका डालने वाले इस घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब हिमाचल के कई अन्य निजी शिक्षण संस्थानों के प्रबंधकों, बिचौलियों और दागी अफसरों में हड़कंप मच गया है। माना जा रहा है कि बंसल की कस्टडी के बाद आने वाले दिनों में ED कई और बड़े चेहरों को बेनकाब करते हुए ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां कर सकती है।


​संपादकीय प्रस्तुति:
​हमीपुर रिपोर्टिंग: उमांशी राणा
​धर्मशाला रिपोर्टिंग: भेषज

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