विशेष स्वास्थ्य समीक्षा | ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा | पंजाब दस्तक
शिमला: हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारें चाहे जितने भी बड़े-बड़े दावे कर लें, लेकिन जब जमीनी हकीकत का विश्लेषण किया जाता है, तो स्थिति बेहद गंभीर और चिंताजनक नजर आती है। प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में केवल नए बेडों के फीते काटकर और नई इमारतों का ढांचा खड़ा करके सुर्खियां बटोरने की होड़ लगी है। लेकिन आम जनता को जिस मुख्य सुविधा—यानी योग्य डॉक्टर, सुपर-स्पेशलिस्ट और तकनीशियनों की जरूरत है—उसका शिमला, धर्मशाला, हमीरपुर और सिरमौर सहित पूरे प्रदेश में भारी अकाल पड़ा हुआ है।
1. बजट की भारी कमी और WHO के मानकों की अनदेखी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के संचालन के लिए सालाना कम से कम ₹12,000 करोड़ के बजट की आवश्यकता है। इसके विपरीत, अगर पिछले 7 वर्षों का इतिहास देखें तो प्रदेश में स्वास्थ्य पर औसतन मात्र ₹2,000 से ₹3,000 करोड़ ही खर्च किए जा रहे हैं।
WHO के कड़े निर्देश: हर कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (CHC) और PRIMARY HEALTH CENTER (PHC) स्तर पर कम से कम 5 सुपर-स्पेशलिस्ट डॉक्टर (पीडियाट्रिक्स, गायनेकोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक्स, इंटरनल मेडिसिन आदि) होने चाहिए और CHC में ऑपरेशन तक की सुविधा होनी अनिवार्य है।
धरातल का सच: मंडी के बलद्वाड़ा से लेकर राज्य के ज्यादातर CHC और PHC में मेडिकल ऑफिसर तो तैनात मिल जाएंगे, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की कुर्सियां सालों से खाली पड़ी हैं।
2. कैग (CAG) रिपोर्ट का खुलासा: चंबा से लेकर सिरमौर तक डॉक्टरों का टोटा
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा कंबाइंड समीक्षा रिपोर्ट (31 मार्च 2023 तक) के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग की पोल खोलते हैं:
जिला चंबा: स्वास्थ्य विभाग में पब्लिक हेल्थ स्टाफ की 79% से 80% तक भारी कमी है। पैरामेडिकल स्टाफ के 47% पद खाली हैं। स्वीकृत 235 डॉक्टरों के पदों में से केवल 104 ही तैनात हैं—यानी सीधे 55.74% डॉक्टरों का शॉर्टफॉल। नर्सों के भी 33% से अधिक पद खाली पड़े हैं।
सिरमौर व दूरदराज के क्षेत्र: सिरमौर के ग्रामीण और दूरदराज इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों का भी यही हाल है, जहां विशेषज्ञ न होने से मरीजों को आपात स्थिति में सोलन या शिमला (IGMC) का रुख करना पड़ता है।
3. बिना गायनेकोलॉजिस्ट के हजारों डिलीवरी: खतरे में माताओं और नवजातों की जान
कैग की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रदेश के कई बड़े CHC में बिना किसी महिला रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) के ही हजारों डिलीवरी करवाई गईं:
CHC ज्वालामुखी (100 बेड): 2016 से 2021 के बीच एक भी गायनेकोलॉजिस्ट नहीं थी, फिर भी 2,617 बच्चों का जन्म बिना विशेषज्ञ डॉक्टर के हुआ।
CHC शाहपुर (100 बेड): 2016 से 2021 के दौरान कुल 1,758 डिलीवरी हुईं, जिनमें से शुरुआती वर्षों में कोई विशेषज्ञ मौजूद ही नहीं था।
CHC बैजनाथ: बिना गायनेकोलॉजिस्ट 686 डिलीवरी।
CHC थुरल: बिना गायनेकोलॉजिस्ट 210 डिलीवरी।
CHC कंडाघाट: बिना गायनेकोलॉजिस्ट 179 डिलीवरी दर्ज की गईं।
4. धूल फांकती मशीनें और रेफरल सेंटर बने जिला अस्पताल
प्रदेश के प्रमुख जिलों—शिमला, धर्मशाला, हमीरपुर और कुल्लू—के क्षेत्रीय अस्पतालों में रोजाना मरीजों का भारी हुजूम उमड़ता है।
धूल फांकते उपकरण: घुमारवीं CHC सहित प्रदेश के दर्जनों स्वास्थ्य केंद्रों में लाखों-करोड़ों की लागत से एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड मशीनें ला तो दी गईं, लेकिन रेडियोग्राफर और ऑपरेटिव स्टाफ न होने के कारण ये मशीनें 10-15 सालों से धूल फांक रही हैं।
कुल्लू जैसी घटनाएं और रेफरल कल्चर: जिला अस्पतालों में डॉक्टरों पर काम का बोझ इतना ज्यादा है कि हाल ही में कुल्लू में लापरवाही और अव्यवस्था के कारण एक महिला की जान चली गई, जिससे लोगों में भारी आक्रोश है। हमीरपुर और धर्मशाला के क्षेत्रीय अस्पतालों से भी गंभीर मरीजों को सीधे शिमला (IGMC) या टांडा (TMC) रेफर कर दिया जाता है।
5. पंजाब दस्तक के तीखे सवाल: आखिर कब जागेगा प्रशासन?
अस्पताल या महज 4 दीवारें?: क्या सरकारें जनता को सिर्फ कंक्रीट के ढांचे और बेडों की संख्या दिखाकर सुर्खियां और वोट बटोरना चाहती हैं?
आपात स्थिति में भगवान भरोसे जनता!: जब अस्पतालों में करोड़ों की मशीनें चलाने के लिए तकनीशियन ही नहीं होंगे और आईसीयू में डॉक्टर नहीं होंगे, तो गरीब मरीज कहां जाए?
कैग (CAG) की रिपोर्ट के बाद भी चुप्पी क्यों?: जब सरकारी आंकड़ों में ही 80% तक स्टाफ की कमी साफ दिख रही है, तो तुरंत स्थायी नियुक्तियां करने के बजाय लीपापोती क्यों की जा रही है?
पंजाब दस्तक का निष्पक्ष दृष्टिकोण
स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी राज्य के नागरिक की सबसे बड़ी बुनियादी जरूरतें हैं। आपात स्थिति में आम आदमी को मजबूरन निजी अस्पतालों में लाखों रुपये फूंकने पड़ते हैं। सरकार को केवल 200 Bed बढ़ा देने या भव्य इमारतों के उद्घाटन तक सीमित न रहकर डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की स्थायी भर्ती करनी होगी तथा स्वास्थ्य बजट को बढ़ाना होगा।
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रिपोर्ट: सुरेंद्र राणा (ब्यूरो चीफ, पंजाब दस्तक)
