देहरा/कांगड़ा (पंजाब दस्तक / वरिष्ठ पत्रकार सुशील):
अंग्रेजों के दौर की ऐतिहासिक धरोहर और कांगड़ा घाटी की जीवनरेखा माना जाने वाला पठानकोट-जोगिंद्रनगर रेलवे ट्रैक आज केंद्र सरकार की बेरुखी और अनदेखी का शिकार होकर रह गया है। कभी घाटी की हसीन वादियों में छुक-छुक दौड़ने वाली यह नैरोगेज ट्रेन अब प्रशासनिक फाइलों और झूठे आश्वासनों में गुम होती नजर आ रही है। स्थानीय जनता और बुद्धिजीवियों का सीधा सवाल है कि क्या केंद्र सरकार हिमाचल प्रदेश के इस सबसे पुराने और महत्वपूर्ण रेलमार्ग को पूरी तरह भुला चुकी है?
पर्यटन और आम जनता की जेब पर भारी मार
यह रेलवे ट्रैक सिर्फ एक सफर का जरिया नहीं, बल्कि कांगड़ा घाटी के गरीब, मजदूर, छात्र और नौकरीपेशा लोगों के लिए सबसे किफायती सहारा रहा है। इसके साथ ही देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए यह ट्रैक आकर्षण का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। लेकिन ट्रैक के लंबे समय से बाधित रहने और सुस्त रफ्तार बहाली के चलते न केवल स्थानीय कारोबार और पर्यटन चौपट हो रहा है, बल्कि आम जनता को महंगे निजी वाहनों में सफर करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
आधुनिकता के दावों के बीच उपेक्षित कांगड़ा वैली
एक तरफ देशभर में बुलेट ट्रेन और वंदे भारत के नाम पर रेलवे के आधुनिकीकरण के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हिमाचल की इस धरोहर को उसके हाल पर बेसहारा छोड़ दिया गया है। ट्रैक के स्थायी सुदृढ़ीकरण, नई सुविधाओं और इसके विस्तार के बड़े-बड़े वादे केवल चुनावी मंचों तक ही सीमित रह गए हैं। धरातल पर काम न होने से क्षेत्रवासियों में केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय के प्रति भारी रोष पनप रहा है।
स्थानीय लोगों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही कांगड़ा रेलवे ट्रैक के पुख्ता रखरखाव, आधुनिकीकरण और नियमित संचालन के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जनता सड़कों पर उतरकर विरोध जताने से भी पीछे नहीं हटेगी।
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