पंजाब दस्तक
शिमला— सुरेंद्र राणा
हिमाचल प्रदेश एचआरटीसी पेंशनर्स संयुक्त संघर्ष समिति ने हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम (HRTC) में अपनी जायज मांगों के लिए आवाज उठा रहे कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों पर सरकार और निगम प्रबंधन द्वारा की जा रही दंडात्मक कार्रवाई की तीखी आलोचना की है। समिति ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों की मांगें मानने या उन पर सकारात्मक विचार-विमर्श करने के बजाय उन पर दबाव बनाना और दंडात्मक कदम उठाना बेहद निंदनीय है।
दमनकारी हथकंडों से बचे सरकार: संगठन पदाधिकारी
बिना वार्ता कार्रवाई करना श्रम कानूनों के खिलाफ:
पथ परिवहन पेंशनर कल्याण संगठन के अध्यक्ष श्री के. सी. चौहान और प्रधान श्री देवराज ठाकुर ने संयुक्त बयान में कहा कि सामूहिक समस्याओं को सरकार और प्रबंधन के समक्ष संगठित रूप से उठाना श्रम कानूनों के तहत हर संगठन का मूलभूत अधिकार है। बिना किसी संवाद या समझौते के सीधे दंडात्मक कार्रवाई करना लोकतंत्र और श्रम अधिकारों का हनन है। सरकार को ऐसे दमनकारी हथकंडों से बचना चाहिए।
पेंशनरों और कर्मचारियों के करोड़ों रुपये बकाया: ब्रिज लाल ठाकुर
हिमाचल परिवहन सेवानिवृत्त कर्मचारी कल्याण मंच के अध्यक्ष श्री ब्रिज लाल ठाकुर ने रोष जताते हुए कहा कि निगम के कर्मचारियों और पेंशनरों का सरकार के पास नाइट ओवरटाइम, पे व पेंशन एरियर, लीव एनकैशमेंट और ग्रैच्युटी के रूप में सैकड़ों करोड़ रुपया बकाया है। सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि इस राशि का भुगतान कब और कैसे किया जाए, लेकिन इसके विपरीत हक मांगने वालों की आवाज को दबाया जा रहा है, जो कि सर्वथा अनुचित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि निगम का हर पेंशनर अपनी हक की इस लड़ाई में कर्मचारियों के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है।
”बसों की छतों पर रातें काटीं, अब इस उम्र में आंदोलन को मजबूर न करे सरकार”
पेंशनर नेताओं ने अपने सेवाकाल के संघर्षपूर्ण दिनों को याद करते हुए भावुक मन से कहा कि आज जो पेंशनर्स 65 से 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं, उन्होंने एचआरटीसी को अपने खून-पसीने से सींचा है।
”जब बसें शिमला, चंबा, हमीरपुर, ऊना से लेकर दिल्ली और हरिद्वार जैसे दूर-दराज और दुर्गम क्षेत्रों के रूटों पर जाती थीं, तो वहां ठहरने के लिए कोई होटल या सुविधाएं नहीं होती थीं। ड्राइवरों और कंडक्टरों ने रात-रात भर बसों के अंदर और बसों की छतों पर सोकर रातें काटी हैं। न खाने का ठिकाना होता था, न सोने का। सुबह 4 बजे सवारियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए मुस्तैदी से बसें लेकर निकल पड़ते थे। आज जीवन के इस पड़ाव पर, जब बच्चों के पास रोजगार नहीं हैं और पूरा परिवार इसी पेंशन और ग्रैच्युटी पर निर्भर है, तब अपने ही हक के लिए तरसना पड़ रहा है। इस उम्र में हम सड़कों पर उतरकर हड़ताल या नारेबाजी नहीं करना चाहते, इसलिए सरकार हमारी भावनाओं को समझे और तानाशाही रवैया छोड़े।”
वार्ता कर ठोस निर्णय ले प्रबंधन: राजेंद्र ठाकुर
समिति के सचिव राजेंद्र ठाकुर ने सरकार और निगम प्रबंधन से पुरजोर मांग की है कि हठधर्मिता छोड़कर तुरंत कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों को वार्ता की मेज पर बुलाया जाए। उन्होंने कहा कि बातचीत के माध्यम से ही कर्मचारियों की समस्याओं को सुना जाए और उनकी वित्तीय देनदारियों के समयबद्ध भुगतान को लेकर कोई ठोस व लिखित निर्णय लिया जाए, ताकि परिवहन व्यवस्था और कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
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