सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ
हिमाचल प्रदेश में पंचायत, बीडीसी और जिला परिषद चुनावों के लिए अब समय बहुत कम रह गया है। इस बीच प्रदेश के 12 जिलों के गांवों से एक महत्वपूर्ण आवाज उठ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों के जागरूक मतदाताओं ने उन उम्मीदवारों और प्रतिनिधियों को एक खास सलाह दी है, जो दिन-भर फेसबुक और व्हाट्सएप पर अपनी फोटो चमकाने में लगे रहते हैं। लोगों का कहना है कि वे अब दिखावे की राजनीति के बजाय ठोस काम और व्यवहार को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर नहीं, लोगों के बीच है असली वोट
जैसे-जैसे मतदान का समय पास आ रहा है, उम्मीदवारों के बीच सोशल मीडिया पर फोटो डालने की होड़ मची है। लेकिन गांव के प्रबुद्ध मतदाताओं का मानना है कि:
दिखावा नहीं, समर्पण चाहिए: हर छोटी बात की फोटो सोशल मीडिया पर डालने से गांव की समस्याएं हल नहीं होतीं। लोग अब उन प्रतिनिधियों को नापसंद करने लगे हैं जो काम कम और दिखावा ज्यादा करते हैं।
व्यवहार ही सबसे बड़ी पूंजी: गांव के लोगों का कहना है कि फेसबुक पर ‘लाइक्स’ पाने से बेहतर है कि नेता अपना स्वभाव और व्यवहार अच्छा रखें। वोट तो आपके आचरण और जनता के बीच आपकी मौजूदगी पर ही मिलेगा।
प्रत्याशियों के लिए गांव के मतदाताओं की महत्वपूर्ण सलाह
डोर-टू-डोर संपर्क बढ़ाएं: मोबाइल की स्क्रीन से बाहर निकलकर गांव की गलियों और लोगों के घर-घर (Door-to-Door) पहुंचें। जनता की उम्मीदों को उनके बीच जाकर ही समझा जा सकता है।
फेसबुक से नहीं, अपनों से जुड़ें: व्हाट्सएप ग्रुपों में अपनी तारीफें करने के बजाय, लोगों के सुख-दुख में शामिल हों।
वोट का आधार: मतदाता का कहना है कि वह फोटो देखकर नहीं, बल्कि उम्मीदवार की मेहनत, उसकी उपलब्धता और उसके सरल स्वभाव को देखकर ही अपना कीमती वोट देगा।
निष्कर्ष: व्यवहार और गांव की गलियां ही पहुंचाएंगी मंजिल तक
जन प्रतिनिधियों को यह बात गहराई से समझ लेनी चाहिए कि फेसबुक के ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ उन्हें उनकी मंजिल (जीत) तक कभी नहीं पहुंचाएंगे। वोट फेसबुक की आभासी दुनिया में नहीं, बल्कि गांव की गलियों और लोगों के द्वार तक पहुंचने से मिलते हैं। जनता आपके फेसबुक पोस्ट को नहीं, बल्कि आपके अच्छे स्वभाव और मिलनसार व्यवहार को याद रखती है। जो नेता केवल ‘फेसबुकिया प्रधान’ बनकर रह गए हैं, लोग उन्हें अब गंभीरता से नहीं ले रहे। अगर चुनाव में सफलता पानी है, तो मोबाइल को जेब में रखकर जनता के बीच पसीना बहाना होगा, क्योंकि मतदाता का भरोसा फोटो से नहीं, बल्कि आपके साथ और संवाद से पैदा होता है।
