तीर्थों पर लंगर और सोसायटियों के भंडारे—श्रद्धा का ‘प्रसाद’ या सेवा की नई दिशा?

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पंजाब दस्तक विशेष: ब्यूरो चीफ सुरेंद्र राणा की रिपोर्ट; भारतवर्ष की इस पवित्र देवभूमि पर दान और सेवा की परंपरा सदियों पुरानी है। शिवरात्रि, हनुमान जयंती और गुरु पर्व जैसे पावन अवसरों पर भंडारे का आयोजन हमारे आपसी प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है। लेकिन आज पंजाब दस्तक एक ऐसा महत्वपूर्ण सवाल उठा रहा है जिस पर हर श्रद्धालु को विचार करना चाहिए—क्या हमारी सेवा का लाभ वास्तव में उस व्यक्ति तक पहुँच रहा है, जो उसका असली हकदार है?धार्मिक और सार्वजनिक स्थलों पर चलने वाला लंगर उन गरीब और जरूरतमंद व्यक्तियों के लिए है जिनके पास भोजन का कोई दूसरा साधन नहीं है। यदि ईश्वर ने हमें इतना समर्थ बनाया है कि हम भोजन का खर्च उठा सकते हैं, तो हमें इन कतारों से बचना चाहिए। हमारी एक थाली का त्याग, उस बेसहारा बुजुर्ग या मजदूर का पेट भर सकता है जिसे शायद अगले वक्त की रोटी का ठिकाना न हो। अक्सर सोसायटियों और कमेटियों में चंदा इकट्ठा करके सामूहिक भोजन के आयोजन किए जाते हैं। सामाजिक प्राणी होने के नाते आपसी मिलन और भाईचारा बहुत जरूरी है, लेकिन दिखावे से बचकर चंदा स्वेच्छा से देना और उसे गुप्त रखना ही ‘दान’ की असली गरिमा है।आजकल सोसायटियों के अलग-अलग ग्रुप्स में चंदे के स्क्रीनशॉट डालने का एक नया चलन शुरू हुआ है। कोई 100, 500 या 1000 रुपये का स्क्रीनशॉट ग्रुप में डालता है, तो दूसरे व्यक्ति पर एक मानसिक दबाव और ‘शर्म’ की स्थिति बन जाती है। दान तो ‘गुप्त दान’ ही श्रेष्ठ माना गया है; स्क्रीनशॉट डालकर प्रदर्शन करने की क्या आवश्यकता है? समाज के इन ग्रुप्स को इस दिखावे की राजनीति से बचना चाहिए, क्योंकि श्रद्धा दबाव से नहीं, दिल से होनी चाहिए।अक्सर तर्क दिया जाता है कि यह तो ‘भगवान का प्रसाद’ है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से प्रसाद एक दाने या मिश्री के टुकड़े में भी पूर्ण होता है। श्रद्धा के लिए एक निवाला काफी है, परंतु पेट भरने के लिए पूरी थाली पर अधिकार उस व्यक्ति का होना चाहिए जिसके पास विकल्प नहीं है। समर्थ व्यक्ति अगर लंगर छोड़कर स्थानीय रेहड़ी-फड़ी वालों से भोजन करेंगे, तो इससे एक गरीब दुकानदार की रोजी-रोटी में भी मदद मिलेगी।हमारा उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि सेवा को और अधिक सार्थक बनाना है। मंदिरों-गुरुद्वारों में श्रद्धा से मत्था टेकें और प्रसाद ग्रहण करें। सोसायटियों में उत्सव जरूर मनाएं, लेकिन कोशिश करें कि भोजन का पहला हिस्सा किसी जरूरतमंद के नाम हो। बचा हुआ खाना नहीं, बल्कि ताज़ा और सम्मानजनक भोजन उन तक पहुँचाएं जो इसके उचित हकदार हैं। याद रखें, किसी जरूरतमंद के चेहरे की तृप्ति ही ईश्वर का असली आशीर्वाद है।

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