शिमला | सुरेंद्र राणा: हिमाचल प्रदेश की आर्थिकी को बचाने के नाम पर आज शिमला के ऐतिहासिक पीटरहॉफ के विशाल हॉल में बुलाई गई सर्वदलीय बैठक किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने के बजाय ‘सियासी रणभूमि’ में तब्दील हो गई। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों ने प्रदेश के भविष्य पर जो तलवार लटकाई है, उसे लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त तकरार देखने को मिली और बैठक बिना किसी साझा प्रस्ताव के समाप्त हो गई।6000 करोड़ का ‘झटका’ और विकास पर ब्रेकबैठक का मुख्य मुद्दा साल 2026 से 2031 के बीच मिलने वाले उस राजस्व घाटा अनुदान (RDG) को लेकर था, जिसे हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य की लाइफलाइन माना जाता है। आयोग की सिफारिशों के कारण प्रदेश को हर साल करीब 6,000 करोड़ रुपये की चपत लग सकती है। वित्त विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह पैसा रुका, तो प्रदेश में नए विकास कार्य और बुनियादी ढांचा पूरी तरह ठप हो जाएगा।हॉल के भीतर गूंजे तीखे सवाल-जवाबमुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कड़ा स्टैंड:”अनुदान रोकना हिमाचल की जनता के साथ सरासर अन्याय है। यह हिमाचल के हक की लड़ाई है। पहाड़ी राज्य होने के नाते यहाँ की चुनौतियां बड़ी हैं। विपक्ष को दलगत राजनीति छोड़कर दिल्ली में प्रदेश का पक्ष मजबूती से रखना चाहिए।”नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर का जोरदार पलटवार:”सरकार अपनी ‘आर्थिक नाकामी’ को केंद्र के मत्थे मढ़कर जनता को गुमराह कर रही है। हॉल में बैठकर चर्चा करने से आर्थिकी नहीं सुधरेगी। सरकार पहले अपनी फिजूलखर्ची रोके। जब तक मंशा साफ नहीं होगी, तब तक ऐसी बैठकों का कोई अर्थ नहीं है।”निष्कर्ष: राजनीति की भेंट चढ़ा हिमाचल का हित!घंटों चली बहस के बाद भी सत्तापक्ष और विपक्ष किसी एक साझा रणनीति पर राजी नहीं हो सके। संसदीय कार्य मंत्री हर्षवर्धन चौहान और भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल के बीच भी तीखी नोकझोंक हुई। पीटरहॉफ के हॉल से बाहर निकले नेताओं के तेवरों से साफ है कि हिमाचल का आर्थिक संकट अब राजनीतिक रस्साकशी की भेंट चढ़ता दिख रहा है।
