फाइलों की चमक और धरातल का अंधेरा: शिमला सचिवालय से दूर सिसक रही है मानवता! कागज़ों पर सुख, धरातल पर दुख

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पंजाब दस्तक: सुरेंद्र राणा की विशेष रिपोर्ट
​शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के आलीशान सचिवालय में बैठकर जब प्रदेश की सेहत का खाका खींचा जाता है, तो सब कुछ ‘गुलाबी’ नज़र आता है। लेकिन जैसे ही आप सचिवालय की फाइलों से बाहर निकलकर प्रदेश के जिलों—हमीरपुर, चंबा, कांगड़ा, मंडी, ऊना, कुल्लू, लाहुल-स्पीति और किन्नौर—की धरातल पर उतरते हैं, तो विकास के दावों की हवा निकल जाती है। सच्चाई यह है कि आज प्रदेश की गरीब जनता कागज़ों पर दिखाए जा रहे ‘सुख’ के बीच अपने वास्तविक ‘दुख’ से जूझ रही है।
​【 सिर्फ मीटिंगों तक सीमित शासन: सचिवालय से गांव की दूरी 】
​अक्सर देखा जाता है कि प्रदेश के मुखिया राजधानी में सचिवों के साथ लंबी बैठकें करते हैं और डीसी स्तर के अधिकारियों को कड़े निर्देश भी देते हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन बंद कमरों की मीटिंगों का नतीजा गांव की पगडंडी तक क्यों नहीं पहुँचता? फाइलों में निर्देश तो जारी हो जाते हैं, लेकिन धरातल पर वे ‘ठंडे बस्ते’ में चले जाते हैं।
​【 कानून बनाम हकीकत: आखिर चूक कहाँ? 】
​सरकार महत्वपूर्ण कानून तो बनाती है, लेकिन वे केवल फाइलों तक सीमित रह जाते हैं। प्रशासनिक सुस्ती के कारण इनका लाभ आम जनता तक नहीं पहुँच पाता। प्रश्न यह है कि अगर कानून और मीटिंगें जनता के लिए हैं, तो उनका प्रभाव जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा?
​【 ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की लापरवाही 】
​सरकार की योजनाओं को गांव तक पहुँचाने की असली जिम्मेदारी ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की होती है। लेकिन ब्लॉक स्तर पर प्रशासनिक ढिलाई के कारण गरीब जनता तक न तो सही जानकारी पहुँच पा रही है और न ही मदद।
​【 दुर्गम क्षेत्रों की त्रासदी: लाहुल-स्पीति और किन्नौर 】
​विशेष रूप से लाहुल-स्पीति और किन्नौर जैसे जनजातीय क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह है। यहाँ के लोग अपनी छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भी मीलों दूर जिला मुख्यालयों पर निर्भर हैं। कानून की ताकत यहाँ पहुँचते-पूँछते दम तोड़ देती है।
​【 अब जवाबदेही की बारी 】
​यह समय केवल आश्वासन और मीटिंगों का नहीं है। अगर कागजों पर ‘सुख’ है, तो वह धरातल पर दिखना भी चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह केवल निर्देश न दे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि वह निर्देश धरातल पर लागू हो रहे हैं या नहीं। अब वक्त है कि बजट और कानून का लाभ गरीब के घर के द्वार तक पहुँचे।
​”जब सचिवालय की मीटिंगें और सरकार के कानून गांव की चौखट तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देते हैं, तो सवाल व्यवस्था की नीयत पर उठना लाजिमी है।”

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