हिमाचल, सुरेन्द्र राणा: हिमाचल के ही शिव की नगरी कहे जाने वाले बैजनाथ की करें तो यहां पर दशहरा पर्व ही नहीं मनाया जाता। यहां के लिए दशहरा का दिन आम दिनों की तरह ही होता है। अगर कोई रावण का पुतला जलाने की कोशिश भी करता है तो वह अगले साल जिंदा नहीं रहता है। या फिर उसे बहुत बड़ी हानि झेलनी होती है। दशहरा ने मनाने की पीछे यहां एक बड़ा कारण छिपा है। दरअसल बैजनाथ रावण की तपोस्थली है। पौराणिक धार्मिक मान्यता है कि यहीं पर रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। जिसके चलते इस स्थान को रावण की तपोस्थली के रूप में मान्यता मिली है। ऐसे में यहां पर रावण को राक्षस के रूप में नहीं बल्कि भगवान शिव के परम भक्त के रूप में देखा जाता है।———-खैर ये तो हो गई हिमाचल की बात लेकिन देवभूमि के अलावा भी कई ऐसे स्थान हैं जहां इस पर्व को नहीं मनाया जाता है। मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी दशहरे पर रावण दहन नहीं होता है। इसकी पीछे की वजह है उनकी पत्नी। दरअसल इस जगह को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। पुराने समय में मंदसौर को दशपुर कहा जाता था। यहां के लोग रावण को दामाद मानते हैं और कई जगह तो बकायदा शोक मनाया जाता है। कहा जाता है यहां रावण का मंदिर है और रावण की पूजा अर्चना की जाती है। इस जगह का नाम मंदसौर भी रावण की पत्नी के नाम पर ही पड़ा है।वहीं एमपी के ही विदिशा में भी रावण को भगवान समान पूजा जाता है। भोपाल से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित रावन गांव में रावण बाबा का मंदिर है। यहां रावण की विशाल प्रतिमा मौजूद है। यहां न केवल रावण की पूजा होती है, बल्कि उसकी आरती भी की जाती है, और शादी-ब्याह से लेकर किसी भी शुभ काम से सबसे पहले रावण बाबा की पूजा करना परंपरा है। यहां पर भी रावण का दहन नहीं किया जाता बल्कि दशहरा के दिन मातम मनाया जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि यहां रहने वाले ब्राह्मण परिवार खुद को रावण का वंशज मानते हैं। उनका मानना है कि रावण कोई खलनायक नहीं, बल्कि ज्ञान और शक्ति का प्रतीक था। यही वजह है कि गांव के लोग अपने वाहनों, घरों और दुकानों पर “जय लंकेश”, “जय रावण बाबा” लिखवाते हैं।इसी तरह अगर हम बात उतर प्रदेश की करें जहां रामजन्मभूमि हैं। वहां भी एक स्खान ऐसा है जहां रावण दहन नहीं बल्कि रावण को पूजा जाता है। दरअसल उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में दशानन मंदिर मौजूद है, जो कि सालभर बंद रहता है और सिर्फ दशहरे के दिन ही इस मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। और फिर रावण का जलाभिषेक कर विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद शुभ मुहूर्त में रावण की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। और उनके आगे अपनी मनोकामनाएं रखी जाती है। कहा जाता है यहां हर दोष से मुक्ति मिलती है । और दशानन हर मनोकामना को पूरी भी करते हैं।वहीं यूपी में ही एक जगह ऐसी भी है जिसे रावण का गांव कहा जाता है औऱ जहां रावण दहन कभी नहीं किया गया- उत्तरप्रदेश के ग्रेटर नोएडा में बिसरख गांव, जिसे पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रावण की जन्मस्थली माना जाता है। यहां रावण को जलाया नहीं, बल्कि उसके ज्ञान के लिए पूजा जाता है। कहा जाता है कि बिसरख गांव का नाम रावण के पिता ऋषि विश्रवा के नाम पर पड़ा। इसका प्राचीन नाम ‘विश्वेशरा’ था, जो समय के साथ बदलकर बिसरख हो गया। गांव के लोग रावण को अपने पूर्वज के तौर पर देखते हैं औऱ दशहरे को पर्व की तरह नहीं बल्कि शोक के साथ मनाया जाता है। यहां रावण की आत्मा की शांति के लिए विशेष पूजा की जाती है।इसी तरह महाकाल की नगरी उज्जैन में रावण को शिव का परम भक्त माना जाता है। उज्जैन से करीब 20 किमी दूर बड़नगर रोड पर चिकली गांव में आज भी रावण की पूजा की जाती है। यहां दशहरे पर रावण दहन नहीं होता है। बल्कि लोग व्रत रखते हैं पूजा करते हैं। महाराष्ट्र के अमरावती जिले के गढ़चिरौली में भी आदिवासी समुदाय रावण को कुलदेवता के रुप में पूजते हैं। यहां पर भी रावण दहन महीं होता। हालांकि ये तो हमने आपको कुछ विशेष स्थान बताए जहां से रावण की सीधा कनेक्शन जुड़ा है लेकिन इसके अलावा भी दक्षिण भारत समेत भारत में कई ऐसे स्थान हैं जहां दशहरा नहीं मनाया जाता और रावण को पूजा जाता है। खैर ये रीति रिवाज हमे ये तो जरूर बता रहे हैं कि भारत की संस्कृति कितनी विविध है, जहां एक ही पात्र को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है- कहीं वह बुराई का प्रतीक है, कहीं उसका दहन होता है तो तो कहीं प्रकांड विद्वान के तौर पर और कहीं पूर्वज के तौर पर उसे पूजा जाता है।
