सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में नगर निकाय चुनावों में विधायकों के वोटिंग अधिकार बहाल किए

सुप्रीम कोर्ट से सुक्खू सरकार को बड़ी राहत: नगर निकाय चुनावों में विधायकों के वोटिंग अधिकार बहाल, हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

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​सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ | पंजाब दस्तक
​शिमला: हिमाचल प्रदेश में नगर निकायों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के चुनाव को लेकर चल रही सियासी खींचतान के बीच सुक्खू सरकार को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें विधायकों को निकाय चुनावों में मतदान करने से रोका गया था। इस आदेश के बाद अब निकाय चुनावों में विधायकों के मतदान का रास्ता साफ हो गया है।


​क्या था मामला?
​राज्य सरकार ने 26 जुलाई 2023 को एक अधिसूचना जारी कर विधायकों को नगर निकायों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में वोट डालने का अधिकार दिया था। इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसके बाद हाई कोर्ट ने सरकार की इस अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगा दी।


​’किंग मेकर’ साबित होंगे विधायक
​इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन नगर निकायों में देखने को मिलेगा, जहां भाजपा या कांग्रेस किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है या मुकाबला बराबरी का है। ऐसे करीबी मुकाबलों में अब संबंधित क्षेत्र के विधायक का एक वोट निर्णायक ‘किंग मेकर’ की भूमिका निभाएगा।


​दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क
​राज्य सरकार: सरकार का तर्क है कि अधिसूचना के तहत विधायकों को यह अधिकार देना पूरी तरह से संवैधानिक और उचित है।
​याचिकाकर्ता: याचिकाकर्ताओं का मानना है कि स्थानीय निकायों के पदाधिकारी चुनने का विशेष अधिकार केवल पार्षदों का होना चाहिए। नंदलाल ठाकुर का कहना है कि विधायक का एक वोट सीधे तौर पर चुनाव के परिणाम बदल सकता है, जो स्थानीय लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
​सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने अपने गणित को फिर से दुरुस्त करना और जीत के लिए नई रणनीति बनाना शुरू कर दिया है।


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