राजगढ़ नगर पंचायत में कांग्रेस को झटका, भाजपा उपाध्यक्ष बनी

हिमाचल में सियासी उलटफेर: बहुमत वाली कांग्रेस नहीं बचा पाई उपाध्यक्ष की कुर्सी, राजगढ़ में भाजपा ने सबको चौंकाया

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वरिष्ठ पत्रकार: मीनाक्षी, सिरमौर
​हिमाचल प्रदेश की सियासत में एक ऐसा घटनाक्रम देखने को मिला है, जिसने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। सिरमौर जिले की राजगढ़ नगर पंचायत में सात सदस्यों वाली नगर पंचायत में पांच पार्षदों के स्पष्ट बहुमत के बावजूद कांग्रेस अपने उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार को निर्वाचित कराने में नाकाम रही। वहीं, महज दो पार्षदों वाली भाजपा समर्थित खेमे ने उपाध्यक्ष पद पर कब्जा जमाकर सबको चौंका दिया है।


​अध्यक्ष कांग्रेस का, उपाध्यक्ष भाजपा के खाते में
​राजगढ़ नगर पंचायत में कांग्रेस समर्थित विक्रम जयलदार को अध्यक्ष चुना गया, जबकि भाजपा समर्थित नरेंद्र ठाकुर निर्विरोध उपाध्यक्ष बने। दिलचस्प बात यह रही कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के लिए एसडीएम एवं रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष किसी अन्य पार्षद ने नामांकन दाखिल नहीं किया, जिसके चलते दोनों पदों पर निर्विरोध चयन हुआ।


​पांच पार्षद होने के बावजूद कांग्रेस क्यों पिछड़ी?
​नगर पंचायत में कांग्रेस के पास पांच पार्षदों का बहुमत है, जबकि भाजपा के केवल दो पार्षद हैं। इसके बावजूद कांग्रेस उपाध्यक्ष पद के लिए अपना उम्मीदवार तक नहीं खड़ा कर सकी। इस घटनाक्रम को पार्टी के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने अपनी आंतरिक बैठक में विक्रम जयलदार को अध्यक्ष और पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष ज्योति साहनी को उपाध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार और कांग्रेस मंडल अध्यक्ष सुनील शर्मा ने भी इसके लिए प्रयास किए, लेकिन पार्टी के ही निर्वाचित पार्षदों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया।


​भीतरघात और असंतोष की चर्चा
​राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद और कथित भीतरघात से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि अध्यक्ष पद के दावेदार विक्रम जयलदार को चुनाव में चुनौती देने के लिए कांग्रेस के भीतर ही एक अन्य उम्मीदवार का नाम भी चर्चा में था। हालांकि विक्रम जयलदार अध्यक्ष पद जीतने में सफल रहे, लेकिन पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष की झलक उपाध्यक्ष पद के चुनाव में साफ दिखाई दी।
​इस चुनाव में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आपसी सहमति की बात कही जा रही है, लेकिन पांच पार्षदों के बहुमत के बाद भी कांग्रेस का उपाध्यक्ष न बन पाना पार्टी की आंतरिक कमजोरी को उजागर कर गया है।


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