कांगड़ा में भाजपा को झटका, पवन काजल के नेतृत्व पर सवाल

कांगड़ा में भाजपा को बड़ा झटका: पवन काजल के क्षेत्र में करारी हार, नेतृत्व पर उठे सवाल

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​वरिष्ठ पत्रकार: भेषज
कांगड़ा: भारतीय जनता पार्टी के लिए कांगड़ा का ताजा चुनावी परिणाम एक बड़ा सबक बनकर सामने आया है। ‘पंजाब दस्तक’ की टीम द्वारा किए गए गहन विश्लेषण के अनुसार, क्षेत्र में पार्टी की स्थिति बेहद चिंताजनक है।


​राजनीति और नेतृत्व के गिरते स्तर पर यह श्लोक बिल्कुल सटीक बैठता है:
​”यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥”
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 21)
​अर्थात, श्रेष्ठ पुरुष (नेता) जैसा आचरण करते हैं, सामान्य जन भी वैसा ही आचरण करते हैं। वे जिसे प्रमाण मानते हैं, संसार भी उसी का अनुसरण करता है।


​जमीनी हकीकत और जनाधार में गिरावट
​टीम ने पवन काजल के विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं से विस्तृत बातचीत की। हालांकि लोग कैमरे के सामने खुलकर बोलने से बच रहे हैं, लेकिन व्यक्तिगत बातचीत में पवन काजल के गिरते जनाधार को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई हैं। स्पष्ट है कि उनके पैरों तले से जमीन खिसक चुकी है।


​चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण
​नगर परिषद की स्थिति
: नगर परिषद के नौ वार्डों में पार्टी को मात्र एक सीट पर जीत मिली है, जबकि शेष आठ वार्डों में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इनमें से सात सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई है।


​जिला परिषद का गणित: जिला परिषद की कुल चार सीटों में से पार्टी को दो पर हार झेलनी पड़ी। जिन दो सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की, वहां भी जीत का मार्जिन लगभग 500 वोटों तक ही सीमित रहा।


​कार्यकर्ताओं का असंतोष और भविष्य की चुनौती
​विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि पवन काजल और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच लगातार दूरियां बढ़ रही हैं। लोगों का मानना है कि ओबीसी लीडरशिप के नाम पर पवन काजल की जो पकड़ थी, वह अब समाप्त हो चुकी है। कार्यकर्ताओं की यह उपेक्षा आने वाले समय में पार्टी के लिए और भी बड़ा संकट पैदा कर सकती है।


​क्या कहता है गुप्त सर्वे?
​धर्मशाला में भाजपा की जीत के विपरीत कांगड़ा में हुई हार पर पार्टी के भीतर मंथन शुरू हो गया है। कांगड़ा को भाजपा का गढ़ माना जाता है, इसलिए पार्टी को यहां तुरंत गुप्त सर्वे करवाना चाहिए। जनमानस और कार्यकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि ओबीसी मतदाताओं की बहुलता वाले इस क्षेत्र में पवन काजल के स्थान पर अब किसी नए और युवा ओबीसी चेहरे को आगे लाने की आवश्यकता है। संगठन की मजबूती के लिए नेतृत्व में बदलाव अब अनिवार्य हो गया है।
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