शिमला (पंजाब दस्तक/सुरेंद्र राणा, ब्यूरो चीफ):
हिमाचल प्रदेश में पेंशन व्यवस्था को लेकर सियासत और प्रशासनिक गलियारों में हलचल एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच अब चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु ‘यूनिफाइड पेंशन स्कीम’ (UPS) बनाम ‘ओल्ड पेंशन स्कीम’ (OPS) बन गया है।
ताजा रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश सरकार को पत्र भेजकर राज्य में यूपीएस लागू करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही संकेत दिया गया है कि यदि प्रदेश में यूपीएस लागू की जाती है, तो राज्य को केंद्र की ओर से लगभग ₹1,600 करोड़ की विशेष आर्थिक सहायता मिल सकती है। इस संभावित सहायता राशि का संदर्भ वित्तीय वर्ष 2025-26 के वित्तीय अनुमानों और प्रस्तावों से जोड़ा जा रहा है।
चुनावी गारंटी और वित्तीय संतुलन के बीच फंसा पेंच
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार ने अपनी प्रमुख चुनावी गारंटी को पूरा करते हुए प्रदेश के कर्मचारियों के लिए पहले ही ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) बहाल कर दी है। ऐसे में केंद्र की ओर से आए इस नए प्रस्ताव ने राज्य के सामने बड़ा नीतिगत सवाल खड़ा कर दिया है।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि वर्ष 2022, 2023 और 2024 के दौरान अनुबंध आधार पर नियुक्त हुए जिन कर्मचारियों को ओपीएस के दायरे से बाहर रखा गया था, यूपीएस के तहत उन्हें पेंशन लाभ के दायरे में लाया जा सकता है।
अंतिम फैसले पर टिकी निगाहें
यद्यपि ₹1,600 करोड़ की सहायता और यूपीएस लागू करने की शर्तों से जुड़े तथ्य वर्तमान में वित्तीय अनुमानों और प्रशासनिक प्रस्तावों पर आधारित हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति राज्य सरकार के आधिकारिक निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी। अब मुख्य सवाल यही है कि क्या वित्तीय दबाव से जूझ रही राज्य सरकार 1,600 करोड़ की आर्थिक मदद के लिए यूपीएस को अपनाएगी, या फिर अपनी पूर्व घोषित ओपीएस व्यवस्था पर ही अडिग रहेगी।
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क्या हिमाचल में ओपीएस व्यवस्था ही जारी रहनी चाहिए?
क्या 1,600 करोड़ की केंद्रीय मदद को देखते हुए यूपीएस लागू करना सही कदम होगा?
कर्मचारियों और राज्य की वित्तीय सेहत के लिहाज से कौन सा विकल्प सबसे बेहतर है?
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